सुप्रीम कोर्ट असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ याचिकाओं पर 16 फरवरी को करेगा सुनवाई
नई दिल्ली, 14 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट सोमवार (16 फरवरी) को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ काररवाई की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर सकता है। हाल ही में सरमा का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें कथित तौर पर उन्हें एक विशेष समुदाय के लोगों पर राइफल से निशाना साधते और गोली चलाते हुए दिखाया गया है। इसके बाद सरमा के खिलाफ काररवाई की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट की कॉज लिस्ट के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी।
उल्लेखनीय है गत 10 फरवरी को सीपीआईएम और सीपीआई के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने वाली टिप्पणी के मामले में काररवाई की मांग की। उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने वाम दलों के नेताओं की याचिका को सूचीबद्ध करने पर विचार करने पर सहमति जताई थी।
वकील निजाम पाशा ने CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने इस मामले को उल्लेख करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की। पाशा ने पीठ के सामने कहा कि वह असम के मौजूदा मुख्यमंत्री के परेशान करने वाले भाषणों के मामले में इस कोर्ट से तुरंत दखल चाहते हैं, जिसमें हाल ही में पोस्ट किया गया एक वीडियो भी शामिल है, जिसमें उन्हें एक विशेष समुदाय के लोगों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया है. उन्होंने कहा कि शिकायतें तो दर्ज की गई हैं, लेकिन कोई FIR दर्ज नहीं की गई है। सीजेआई ने कहा, ‘समस्या यह है कि जब भी चुनाव आते हैं तो चुनाव का कुछ हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के अंदर लड़ा जाता है। यही समस्या है। हम पता लगाएंगे…तारीख बताएंगे।’
वहीं सीपीआईएम की तरफ से दायर याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट से तुरंत दखल देने की मांग करता है ताकि प्रतिवादी नंबर 4 हिमंत बिस्वा सरमा के, जो अभी असम के मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर हैं, लगातार दिए जा रहे नफरती बयान (hate speech) के पैटर्न पर संज्ञान लिया जा सके।
याचिका में जोर देकर कहा गया कि भाषणों में असम के मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया है, डराया गया है, और उनके खिलाफ दुश्मनी और खुली हिंसा भड़काई गई है। याचिका में कहा गया है कि सरमा ने कई मौकों पर राज्य की क्षेत्रीय सीमाओं के अंदर और बाहर सार्वजनिक भाषण दिए हैं और बयान दिए हैं, जिन्हें प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म पर व्यापक रूप से प्रसारित किया गया है।
याचिका में कहा गया है, “कुल मिलाकर देखें तो ये बयान स्पष्ट रूप से नफरती बयान लगते हैं क्योंकि ये एक अल्पसंख्यक समुदाय को नीचा दिखाते हैं, गलत और बदनाम करने वाली सोच फैलाते हैं, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के लिए उकसाते हैं, और उस समुदाय के खिलाफ बहिष्कार और हिंसा के हालात को बढ़ावा देते हैं।”
