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सुप्रीम कोर्ट का फैसला : SIR में कोई खामी नहीं, यह निर्वाचन आयोग का संवैधानिक अधिकार

Revoi Editor
Last updated: May 27, 2026 2:20 pm
Revoi Editor
Published: May 27, 2026
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नई दिल्ली, 27 मई। सर्वोच्च न्यायालय ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के फैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर बुधवार को फैसला सुनाते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है और यह चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है।

SIR पर चुनाव आयोग की सभी शक्तियां पहले की तहर बरकरार रहेंगी

देश के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि SIR पर चुनाव आयोग की सभी शक्तियां पहले की तहर बरकरार रहेंगी। चुनाव आयोग ने इस अभियान के लिए पूरी कानूनी प्रकिया का पालन किया। यह पूरे देश में चलता रहेगा। चुनाव आयोग के पास वोटर को शामिल करने से इनकार का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि फ्री और फेयर चुनाव होना चाहिए।

दरअसल, याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा कराए जा रहे एसआईआर की वैधता को चुनौती दी गई थी। अदालत को यह तय करना था कि क्या चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 326, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत वर्तमान स्वरूप में एसआईआर कराने का अधिकार है। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ने कई महत्वपूर्ण सवालों पर विचार किया। इनमें यह भी शामिल था कि क्या चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का संवैधानिक अधिकार है और क्या एसआईआर के जरिए आयोग नागरिकता तय करने की कोशिश कर रहा है।

CJI सूर्यकांत बोले – स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है तो यह भी देखना होगा कि उसकी प्रक्रिया क्या होगी। हालांकि, केवल प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों के आधार पर पूरे एसआईआर को अवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। पीठ ने यह भी कहा कि यह सवाल उठाया गया कि क्या इस समय एसआईआर कराने की कोई वैध आवश्यकता है। अदालत की राय में एसआईआर के दौरान उठाए गए कदम जरूरत के मुताबिक थे।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि एसआईआर बिहार में चुनाव प्रक्रिया और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक दायित्व से ध्यान नहीं भटकाता। उन्होंने मतदाताओं पर खुद को साबित करने का बोझ डालने वाली दलील को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से कहीं और रहने लगा है, तब भी वह पुरानी एसआईआर प्रक्रिया से बाहर नहीं हो जाता। उसका या उसके परिवार का नाम पुराने रिकॉर्ड में मौजूद होगा।

अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर उन्हें सूची में शामिल किया है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता। सीजेआई ने कहा कि यह नहीं माना जा सकता कि एसआईआर का उद्देश्य लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना था। यदि कोई दस्तावेज सही नहीं पाया जाता तो चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम शामिल करने से इनकार कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग नागरिकता तय कर रहा है।

पीठ ने कहा कि अदालत का निष्कर्ष है कि एसआईआर संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की कसौटी पर खरा उतरता है। प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इतने विस्तृत कार्य को देखते हुए चुनाव आयोग को नियम और प्रक्रिया तय करने का अधिकार है। चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता। हालांकि, वह संदिग्ध लोगों के मामलों को केंद्र सरकार को भेज सकता है। चुनाव आयोग जिन लोगों की नागरिकता पर संदेह जताता है, उनकी जानकारी चार सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण को दे। सक्षम प्राधिकरण अगले चुनाव से पहले तक उनके बारे में निर्णय ले।

इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पीयूसीएल समेत कई संगठनों और विपक्षी नेताओं ने याचिकाएं दाखिल की थीं। याचिकाकर्ताओं में मनोज झा, महुआ मोइत्रा, के. सी. वेणुगोपाल, पप्पू यादव और राजद सांसद सुधाकर सिंह भी शामिल हैं।

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