नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर संस्कृत के एक सुभाषित के जरिए विनम्रता और निरंतर सीखते रहने का संदेश दिया। उन्होंने एक श्लोक साझा करते हुए समझाया कि व्यक्ति को अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर अहंकार नहीं करना चाहिए, बल्कि हमेशा सीखने और खुद को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पोस्ट में संस्कृत का यह श्लोक साझा किया-
“खद्योतो द्योतते तावद् यावन्नोदयते शशी।
उदिते तु सहस्रांशौ न खद्योतो न चन्द्रमाः॥”
इस श्लोक का भावार्थ है कि जुगनू तब तक चमकता दिखाई देता है, जब तक चंद्रमा का उदय नहीं होता। लेकिन जब हजारों किरणों वाला सूर्य उदित होता है, तो न जुगनू का प्रकाश दिखाई देता है और न ही चंद्रमा का।
क्या है इस संस्कृत श्लोक का संदेश?
इस सुभाषित के माध्यम से बताया गया है कि किसी व्यक्ति की प्रतिभा और उपलब्धियों का प्रभाव परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है। जब तक उससे अधिक योग्य या प्रतिभाशाली व्यक्ति सामने नहीं आता, तब तक उसकी उपलब्धियां बड़ी दिखाई दे सकती हैं। लेकिन किसी श्रेष्ठ व्यक्ति के सामने आने पर पहले का प्रभाव कम हो सकता है।
श्लोक में जुगनू, चंद्रमा और सूर्य के उदाहरण के जरिए इसी बात को समझाया गया है। जिस तरह सूर्य के प्रकाश के सामने जुगनू और चंद्रमा का प्रकाश फीका पड़ जाता है, उसी तरह ज्ञान, प्रतिभा और उपलब्धियों के क्षेत्र में भी हमेशा आगे बढ़ने की गुंजाइश बनी रहती है।
अहंकार नहीं, विनम्रता से मिलती है आगे बढ़ने की प्रेरणा
प्रधानमंत्री मोदी की ओर से साझा किए गए इस सुभाषित का मुख्य संदेश है कि व्यक्ति को अपनी सफलता पर अहंकार करने के बजाय विनम्र बने रहना चाहिए। जीवन में ज्ञान और अनुभव की कोई अंतिम सीमा नहीं होती। इसलिए दूसरों से सीखने, अपनी कमियों को पहचानने और लगातार बेहतर बनने की कोशिश करना जरूरी है। यह संस्कृत सुभाषित परंपरा में प्रचलित एक प्रसिद्ध पद्य है, जिसे विभिन्न सुभाषित संग्रहों में उद्धृत किया गया है। इसका सार यही है कि वास्तविक श्रेष्ठता केवल अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने में नहीं, बल्कि विनम्रता के साथ निरंतर आगे बढ़ने में है।


