Dussehra: पीएम मोदी ने किया भगवान श्रीराम का गुणगान, शेयर किया वाल्मीकि रामायण का श्लोक; जानें इसका अर्थ

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर। विजयादशमी के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को शुभकामनाएं दीं और भगवान श्रीराम की महिमा का वर्णन करने वाला संस्कृत सुभाषित साझा किया। प्रधानमंत्री ने कामना की कि उल्लास और विश्वास से भरा यह पर्व हर व्यक्ति के संकल्प को नई शक्ति प्रदान करे तथा सभी के जीवन में सुख, सौभाग्य और सफलता लेकर आए। भगवान श्रीराम पर साझा किए गए श्लोक में उन्हें धर्म का साक्षात स्वरूप, सत्यपराक्रमी और समस्त लोकों का रक्षक बताया गया है।

पीएम मोदी ने एक्स पर दी विजयादशमी की बधाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने संदेश में लिखा, “आप सभी को विजयादशमी की अनंत शुभकामनाएं। उल्लास और विश्वास का यह विजय पर्व हर किसी के संकल्प को नई शक्ति प्रदान करे। सभी का जीवन सुख-सौभाग्य और सफलता से समृद्ध हो, यही कामना है।”

प्रधानमंत्री ने अपने एक अन्य पोस्ट में संस्कृत का एक सुभाषित साझा किया, जिसमें भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र, धर्मनिष्ठा और पराक्रम का वर्णन किया गया है।

पीएम मोदी ने साझा किया भगवान श्रीराम पर संस्कृत श्लोक

प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया श्लोक है:

“रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव॥”

यह श्लोक भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व और उनके धर्मपरायण जीवन की विशेषताओं को उजागर करता है। इसमें श्रीराम को धर्म का साकार स्वरूप, सज्जनों का सहारा और सत्य के लिए पराक्रम करने वाला बताया गया है।

क्या है श्लोक का हिंदी अर्थ?

इस संस्कृत श्लोक का भावार्थ है कि भगवान श्रीराम स्वयं धर्म के सजीव स्वरूप हैं। वे सज्जनों के रक्षक, सत्य के प्रति समर्पित और अद्भुत पराक्रम वाले हैं। जिस प्रकार देवराज इंद्र देवलोक के अधिपति और रक्षक हैं, उसी प्रकार श्रीराम समस्त लोकों के पालन और संरक्षण का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

श्लोक में श्रीराम के ऐसे व्यक्तित्व का वर्णन है, जिसमें धर्म केवल उपदेश या सिद्धांत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके आचरण, वचनों और कर्तव्यों में दिखाई देता है।

वाल्मीकि रामायण से जुड़ा है श्लोक

यह श्लोक महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के सर्ग 37 के श्लोक 13 के रूप में उद्धृत किया जाता है। रामायण के इस प्रसंग में भगवान श्रीराम के गुणों, उनके प्रभाव और धर्म के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का वर्णन मिलता है।

धार्मिक परंपरा के अनुसार, जब राक्षस ऋषियों और वन में तपस्या करने वाले साधु-संतों को परेशान कर रहे थे, तब श्रीराम ने उनकी रक्षा और धर्म की स्थापना का संकल्प लिया। उनका चरित्र इस आदर्श को सामने रखता है कि शक्ति का उपयोग अन्याय और अत्याचार को रोकने तथा निर्बलों की रक्षा के लिए किया जाना चाहिए।

श्रीराम के जीवन से मिलता है धर्म और कर्तव्य का संदेश

इस श्लोक का व्यापक संदेश यह है कि धर्म केवल नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक दायित्व को ईमानदारी और न्याय के साथ निभाना भी है। पुत्र, भाई, मित्र या राजा के रूप में भगवान श्रीराम का चरित्र मर्यादा, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपालन की प्रेरणा देता है।

विजयादशमी के अवसर पर श्रीराम के इस स्वरूप का स्मरण बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अधर्म पर धर्म की विजय के संदेश को और प्रासंगिक बनाता है। यही कारण है कि दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में सत्य, साहस और सदाचार अपनाने की प्रेरणा देने वाला अवसर भी माना जाता है।

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