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लिव-इन रिलेशनशिप के आधुनिक जाल में महिलाओं को पत्नी का दर्जा दिया जाए : मद्रास हाई कोर्ट

लिव-इन रिलेशनशिप के आधुनिक जाल में महिलाओं को पत्नी का दर्जा दिया जाए : मद्रास हाई कोर्ट

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मदुरै, 21 जनवरी। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को कानूनी सुरक्षा के बिना नहीं छोड़ा जाना चाहिए और सही मामलों में उन्हें ‘पत्नी’ का दर्जा दिया जा सकता है। कोर्ट ने इसकी तुलना भारतीय परंपरा के गंधर्व विवाह से की।

वेबसाइनट ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार यह टिप्पणी जस्टिस एस श्रीमथी ने तिरुचिरापल्ली जिले के एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसे लिव-इन पार्टनर से जुड़े एक मामले में गिरफ्तारी का डर था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि उस व्यक्ति ने शादी का वादा करके महिला के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बाद में वह मुकर गया।

लिव-इन रिलेशनशिप भारतीय समाज के लिए ‘कल्चरल शॉक’

लिव-इन रिलेशनशिप को भारतीय समाज के लिए ‘कल्चरल शॉक’ करारा देते हुए जज ने कहा कि फिर भी ये बहुत आम हैं। उन्होंने कहा कि महिलाएं खुद को मॉडर्न समझकर लिव-इन रिलेशनशिप में आती हैं, लेकिन बाद में उन्हें एहसास होता है कि कानून शादी जैसे प्रोटेक्शन अपने आप नहीं देता।

कोर्ट ने गंधर्व विवाह से की लिव-इन रिलेशनशिप की तुलना

हाई कोर्ट ने कहा कि पुराने भारतीय ग्रंथों में शादी के आठ रूपों को मान्यता दी गई है, जिसमें गंधर्व विवाह भी शामिल है, जिसमें बिना किसी रीति-रिवाज के आपसी प्यार और सहमति से रिश्ता बनता था। जज ने कहा कि आज के लिव-इन रिलेशनशिप को भी इसी नजरिए से देखा जा सकता है ताकि यह पक्का हो सके कि महिलाओं को कमजो न बनाया जाए।

लिव-इन के ‘आधुनिक जाल’ में फंसी महिलाओं की रक्षा करना अदालतों का कर्तव्य

जस्टिस श्रीमथी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप के ‘आधुनिक जाल’ में फंसी महिलाओं की रक्षा करना अदालतों का कर्तव्य है क्योंकि उनके पास अक्सर शादीशुदा महिलाओं को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा नहीं होती। उन्होंने यह भी बताया कि पुरुष इस कानूनी अस्पष्टता का कैसे फायदा उठाते हैं। शुरुआत में वे खुद को मॉडर्न दिखाते हैं, लेकिन जब रिश्ता खराब होता है तो वे महिला के चरित्र पर सवाल उठाते हैं।

यदि शादी मुमकिन नहीं तो पुरुषों को कानून का सामना करना होगा

भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 का जिक्र करते हुए जज ने कहा कि धोखे पर आधारित यौन संबंध, खासकर शादी के झूठे वादे एक आपराधिक अपराध हैं। उन्होंने आगे कहा कि जो आदमी ऐसा वादा करता है और बाद में शादी करने से मना कर देता है, वह कानून से बच नहीं सकता। जमानत अर्जी खारिज करते हुए जस्टिस श्रीमथी ने कहा, ‘यदि शादी मुमकिन नहीं है तो पुरुषों को कानून का सामना करना होगा।’

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