ख़ामेनेई की हत्या और भारत सरकार की कूटनीति
By Varsha Pargat
अमेरिका और ईरान का युद्ध शुरू होते ही पहला और बड़ा झटका ईरान को लगा, वह था वहां के सुप्रीम लीडर ख़ामेनेई की हत्या। अमेरिका बहुत बड़ी गलतफहमी में था की ख़ामेनेई की हत्या के बाद वो ईरान को अपने कब्ज़े में कर के, वहाँ अपने पसंदीदा व्यक्ति को वहा का शासक बना देगा। लेकिन अमेरिका के सारे मनसूबों पर पानी फिर गया। ख़ामेनेई के निधन के पश्चात भी ईरान लड़ रहा है। ईरान ने अपनी रणनीति बदली और अपने पड़ोसी देशों पर लगातार हमले करना शुरु कर दिए। जहां-जहां भी अमेरिका के सैन्य अड्डे है वहा वह लगातार हमले कर रहा हैं।
ईरान की इस नीति के कारण कई सारे देश युद्ध की चपेट में आ गये हैं। डोनाल्ड ट्रंप का रास्ता अभी तो आसान नहीं लग रहा हैं। वर्तमान परिस्थिति में यह कहा जा सकता है की एक सत्ता को हटाने के लिए लड़ रहा है वही दुसरा अपनी सत्ता बचाने के लिए।
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जब डोनाल्ड ट्रंप यह कहते है की “ईरान में सत्ता बदलनी है, और लोकतंत्र को स्थापित करना है।” वहीं दूसरी और डोनाल्ड ट्रंप अपनी सत्ता बचाना चाहते है। उनकी घटती हुई लोकप्रियता यह चिन्हित करती है की यदि अमेरिका में अभी मध्यावदी चुनाव हुए तो उनकी हार निश्चित है। उनके ऊपर इम्पीचमेंट मोशन भी लाया जा सकता है। यही डर उनको सता रहा है और इसीलिए उन्होंने अमेरिका को युद्ध में झोंक दिया है। अब डोनाल्ड ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है की “इस युद्ध से अब बाहर कैसे निकला जाए”।
अमेरिका के पूर्व जनरल कॉलिन पॉवेल, जिन्होंने सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट के पद पर भी कार्य किया है, वे कहते है की – “Force should be employed only as a last resort, after all non-violent means have been exhausted. If war is necessary, however, it should proceed in pursuit of a clear objective, with a clear exit strategy and with public support. It should employ overwhelming, decisive force to defeat the enemy, using every resource including military, economic, political and social.
पॉवेल आगे यह भी कहते है – “Military leader could not quietly acquiesce in half hearted warfare for half-backed reasons that the American People could not understand or support.”
डोनाल्ड ट्रंप का युद्ध का निर्णय कुछ इसी तरह का दिख रहा है। टुम्प सरकार ने युद्ध के संदर्भ में जो योजना बनायी थी उसके हिसाब तो यह युद्ध आगे बढ़ता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। ईरान ने जिस तरह से युद्ध का प्रतिकार किया एवं जिस रणनीति से आगे बढ़ रहा है उसने अमेरिका सहित खाड़ी देशों को भी सकते में डाल दिया है। खाड़ी देशों के साथ-साथ यूरोप भी इस आग में झुलस रहा है।

जहाँ तक भारत का सवाल है, भारत ने इस युद्ध के विषय में कोई भी अवांछित टिप्पणी करने से परहेज किया है। जब से युद्ध शुरु हुआ और ख़ामेनेई की हत्या हुई तब से भारत के विपक्ष और नेता भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं।
इतना ही नहीं काँग्रेस की नेत्री श्रीमती सोनिया गाँधी ने एक बड़े अख़बार में लेख लिखकर मोदीजी की चुप्पी और भारत सरकार की विदेश नीति पर तीखा प्रहार किया है।
भारत सरकार ने शुरु के तीन चार दिनों तक बहुत सावधानी से काम किया। कोई भी प्रतिक्रिया देने से दुरी बनाये रखी। परन्तु पर्दे के पीछे से सरकार ने कई खाड़ी देशों के प्रमुखों के साथ संवाद बनाए रखा। अपनी चिंता जताई। भारत सरकार ने खाड़ी देशों में रह रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा हेतु एवं उन्हें वहां से सुरक्षित अपने देश में कैसे लाया जा सकता है इस सन्दर्भ में प्रयास किये। भारत सरकार और विदेश मंत्री डॉ.जयशंकर ने इस सन्दर्भ में फ़ोन पर बात की। फ्रांस के राष्ट्राध्यक्ष इमैनुएल मैक्रॉन से भी बात की।
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दूसरी और विपक्ष हमलावर हो रहा था की “ख़ामेनेई” के निधन पर सरकार की चुप्पी का अर्थ – “भारत, अमेरिका और इजराइल के साथ है”। “मौन स्वीकृति” का आरोप लगाया। लेकिन इसी बीच हमने देखा की विदेश सचिव विक्रम मिसरी, भारत में स्थित ईरान के दूतावास गए और वहां जाकर उन्होंने भारत सरकार की ओर से “शोक संदेश” लिखा। ईरान के राजदूत से बात करते हुए भारत सरकार की ओर से संवेदना व्यक्त की।
सरकार ने एक तीर से दो निशाने साधे। एक यह कि ईरान के लोगों को अपनी संवेदना भेजी और साथ ही विपक्ष को चौंका दिया। काँग्रेस एवं विपक्षी दलों को इसकी कतई अपेक्षा नहीं थी।
साथ में एक और बात बताना आवश्यक है कि भारत में जो शिया मुस्लिम अमेरिका के विरोध में प्रदर्शन करते हुए दिख रहे थे उन्हें भी सन्देश दे दिया। इस मुद्दे पर विपक्ष द्वारा की जा रही राजनीति को एक झटका लगा। अब देखने में आ रहा है कि कांग्रेस के कई नेता ईरानी दूतावास जाकर अपनी संवेदना व्यक्त कर रहे हैं। इस से यह संदेश भी प्रबल हो रहा है कि विपक्ष अपनी राजनीति साधने के चक्कर में, राष्ट्रहित को दरकिनार कर रहा है।
भारत सरकार ने विक्रम मिसरी को भेजकर राष्ट्रहित और विदेश नीति दोनों में संतुलन स्थापित करते हुए देश की जनता एवं विपक्ष को एक बड़ा सन्देश दिया है।
