नई दिल्ली, पांच नवम्बर। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के हाल ही में अधिसूचित किए गए नियमों की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाने पर विचार कर रही है। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना है।
नियमों की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाने पर विचार
देश के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच आज यूजीसी नियमों के खिलाफ कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने बेंच के सामने केंद्र सरकार की तरफ से पैरवी की।
SG तुषार मेहता बोले- हर छात्र का ध्यान रखना सरकार का मकसद
सुनवाई के दौरान मेहता ने बेंच को बताया कि सरकार इस मुद्दे की जांच कर रही है। बेंच ने कहा कि हर छात्र के हितों की रक्षा करना और यह पक्का करना जरूरी है कि युवा पीढ़ी का ध्यान रखा जाए। तुषार मेहता ने जोर देकर कहा कि परीक्षा का मकसद यह पक्का करना है कि कोई भी वर्ग नाखुश या डरा हुआ महसूस न करे और छात्रों की चिंताओं को दूर किया जाए।
मेहता के आश्वासन पर बेंच ने मामले की सुनवाई टाल दी
बेंच ने तुषार मेहता से पूछा कि आप यूजीसी विनियम पर फिर से क्यों सोचते हैं। इस पर मेहता ने बेंच से कहा कि सरकार ने यह फैसला लिया है कि हर छात्र का ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी को कोई डर नहीं होना चाहिए। सरकार युवा पीढ़ी के हितों पर विचार कर रही है और एक कमेटी बनाने पर विचार कर रही है। मेहता की बातों पर ध्यान देते हुए बेंच ने मामले की सुनवाई टाल दी।
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी, 2026 में यूजीसी नियमों पर रोक लगा दी थी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) नियम, 2026 (रेगुलेशंस) 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे और ये भारत के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होते हैं। इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। वह इसलिए कि ‘जनरल कैटेगरी’ के छात्रों को इसके शिकायत निवारण प्रणाली के तहत शिकायत करने से बाहर रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी, 2026 में इन नियमों पर रोक लगा दी थी। इसके बाद से ही मामले को लेकर सुनवाई चल रही है।
नियमों के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों को वंचित समूहों के लिए नीतियों और कार्यक्रम को असरदार तरीके से लागू करने और भेदभाव की शिकायतों की जांच करने के लिए समान अवसर केंद्र और समानता समितियां बनानी होंगी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि नियम बहिष्कार करने वाले थे। वह इसलिए कि इसमें वैसे लोग जो सामान्य वर्ग से है और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं हैं, वे शिकायत निवारण और संस्थागत सुरक्षा से वंचित हो जाएंगे।


