1. Home
  2. राज्य
  3. उत्तरप्रदेश
  4. इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी- ‘कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं तो डीएम-एसपी इस्तीफा दे दें या ट्रांसफर करा लें’
इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी- ‘कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं तो डीएम-एसपी इस्तीफा दे दें या ट्रांसफर करा लें’

इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी- ‘कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं तो डीएम-एसपी इस्तीफा दे दें या ट्रांसफर करा लें’

0
Social Share

प्रयागराज, 14 मार्च। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संभल की मस्जिद के भीतर नमाजियों की संख्या सीमित करने के सरकारी तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की है। इस क्रम में कोर्ट ने कहा कि हर परिस्थिति में कानून का शासन सुनिश्चित करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि अधिकारी कानून-व्यवस्था संभालने में खुद को अक्षम पाते हैं तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। कोर्ट ने सुझाव दिया कि यदि डीएम और एसपी स्थिति नियंत्रित नहीं कर सकते, तो उन्हें इस्तीफा देना चाहिए या जिले से स्थानांतरण करा लेना चाहिए।

मुनाजिर खान की याचिका पर सुनवाई

अदालत ने कहा कि राज्य का यह उत्तरदायित्व है कि प्रत्येक समुदाय अपने निर्धारित पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक प्रार्थना कर सके। यदि कोई पूजा स्थल निजी संपत्ति है तो वहां धार्मिक क्रियाकलापों के लिए राज्य से किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है।

हाई कोर्ट ने पहले भी स्पष्ट कर रखा है कि राज्य का हस्तक्षेप केवल तभी अनिवार्य है, जब धार्मिक कार्य सार्वजनिक भूमि पर हो रहे हों। यह आदेश संभल के निवासी मुनाजिर खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है, जिन्होंने नमाज पर लगी पाबंदी को चुनौती दी थी।

भूमि स्वामित्व को लेकर विवाद

याचिकाकर्ता मुनाजिर खान ने आरोप लगाया था कि उन्हें गाटा संख्या 291 पर रमजान के दौरान नमाज अदा करने से अनुचित रूप से रोका जा रहा है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि संबंधित जमीन के स्वामित्व को लेकर राजस्व अभिलेखों में विवाद है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यह जमीन मोहन सिंह और भूराज सिंह के नाम पर दर्ज है न कि किसी मस्जिद के नाम पर। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए केवल 20 नमाजियों को ही वहां नमाज अदा करने की अनुमति दी थी।

 

मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने उस स्थान या मस्जिद की कोई तस्वीर कोर्ट में पेश नहीं की है, जहां नमाज अदा की जानी है। सरकारी वकील ने दलील दी कि बड़ी भीड़ जुटने से सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है, इसलिए संख्या सीमित की गई। कोर्ट ने इस दलील को प्रशासनिक विफलता मानते हुए याचिकाकर्ता को नमाज के स्थान के फोटो और राजस्व रिकॉर्ड पेश करने का समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च को होगी, जिसे कोर्ट ने शीर्ष दस मामलों की सूची में रखा है।

Join our WhatsApp Channel

And stay informed with the latest news and updates.

Join Now
revoi whats app qr code