UN में भारत की दोटूक: 80 साल पुराने युद्ध से तय नहीं होगी दुनिया की दिशा, सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग

संयुक्त राष्ट्र, 23 अक्टूबर। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग को एक बार फिर जोरदार तरीके से उठाया है। भारत ने कहा है कि 80 साल पहले हुए द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों के आधार पर आज की दुनिया की दिशा तय नहीं की जा सकती। मौजूदा सुरक्षा परिषद वैश्विक वास्तविकताओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती, जिससे संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में गुरुवार को भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध में मिली जीत के आधार पर हासिल विशेष अधिकार आज की दुनिया में सुरक्षा परिषद की वैधता की कमी को दूर नहीं कर सकते। उन्होंने जोर दिया कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था में सुधार जरूरी है।

  • द्वितीय विश्व युद्ध में भारत के योगदान का किया जिक्र

पी. हरीश ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता आज भी मुख्य रूप से उन देशों के पास है, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध का विजेता माना जाता है। उन्होंने इस संदर्भ में युद्ध के दौरान भारत के योगदान और भारतीय सैनिकों के बलिदान को भी याद किया।

उन्होंने बताया कि करीब 25 लाख भारतीयों ने युद्ध में हिस्सा लिया था, जबकि लगभग 90 हजार भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके अलावा, औपनिवेशिक नीतियों से जुड़े बंगाल अकाल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस त्रासदी में 40 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी।

हरीश के अनुसार, इतिहास के इन पहलुओं को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था, जो विजेता देशों के प्रभाव में बनी, उसमें पीड़ितों की चिंताओं और अनुभवों को पर्याप्त जगह नहीं मिल सकी।

  • सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया तेज करने की मांग

भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत कुछ देशों को मिले विशेष अधिकार सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया को बाधित करने का माध्यम नहीं बनने चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) को अनिश्चितकाल तक टालना उचित नहीं है।

भारत ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए लिखित मसौदा पाठ, स्पष्ट समय-सीमा और ठोस दिशा तय करने पर जोर दिया। भारत का मानना है कि जब तक बातचीत के लिए औपचारिक आधार तैयार नहीं होगा, तब तक सुधार की दिशा में सार्थक प्रगति करना मुश्किल रहेगा।

  • पाकिस्तान समेत कुछ देशों पर लगाया प्रक्रिया बाधित करने का आरोप

पी. हरीश ने आरोप लगाया कि इटली के नेतृत्व वाले कुछ देशों का समूह, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है, प्रक्रियागत आपत्तियों के जरिए वार्ता के लिए जरूरी मसौदा पाठ को अपनाने में बाधा डाल रहा है। यह समूह ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (UFC) के नाम से जाना जाता है।

यह समूह मसौदा पाठ अपनाने से पहले व्यापक सहमति की जरूरत पर जोर देता है। हालांकि, भारतीय प्रतिनिधि ने इस दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा कि बहुपक्षीय वार्ताओं में बातचीत शुरू करने के लिए मसौदा पाठ जरूरी होता है, न कि बातचीत पूरी होने के बाद।

  • भारत ने दोहराया: वैश्विक संस्थाओं में जरूरी है बदलाव

भारत का कहना है कि सुरक्षा परिषद में सुधार की बातचीत भी संयुक्त राष्ट्र की अन्य प्रक्रियाओं की तरह लिखित मसौदे के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए। बदलती वैश्विक व्यवस्था में अधिक प्रतिनिधित्व और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सुधार जरूरी हैं।

भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद के विस्तार और उसमें विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग करता रहा है। भारत के ताजा बयान से एक बार फिर स्पष्ट हुआ है कि वह मौजूदा व्यवस्था में बदलाव और सुधार प्रक्रिया को ठोस समय-सीमा के भीतर आगे बढ़ाने का पक्षधर है।

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