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TMC में नहीं रुक रही भगदड़ ! अब सुखेंदु शेखर राय ने दिया पार्टी और राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा

TMC में नहीं रुक रही भगदड़ ! अब सुखेंदु शेखर राय ने दिया पार्टी और राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा

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कोलकाता/नई दिल्ली, 8 जून। तृणमूल कांग्रेस को सोमवार को उस वक्त बड़ा राजनीतिक झटका लगा, जब पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सदस्य सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने के साथ ही उच्च सदन की सदस्यता भी छोड़ दी। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी में लंबे समय से जारी आंतरिक असंतोष के बीच राय का यह कदम संकेत है कि संगठन के भीतर खींचतान अब पार्टी के संसदीय दल तक भी पहुंच गई है।  तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल और संसद में पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में गिने जाने वाले राय ने राष्ट्रीय राजधानी में अपने इस्तीफे की घोषणा ऐसे समय की, जब कुछ ही घंटों बाद विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की बैठक होने वाली थी।

इस बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी भी शामिल हुए। राय का इस्तीफा, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के विधायक दल में बगावत के कुछ दिन बाद आया है। पार्टी के 58 विधायकों ने नेतृत्व की लाइन से अलग रुख अपनाते हुए विपक्ष के नेता पद के लिए रिताब्रता बनर्जी का समर्थन किया था और पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार शोभनदेव चट्टोपाध्याय को खारिज कर दिया था। इस विद्रोह का अंत विधानसभा अध्यक्ष द्वारा रिताब्रता को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने के साथ हुआ। इसने विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद संगठन के भीतर गहरी दरारें उजागर कर दीं और इस आशंका को हवा दी कि यह अशांति विधानसभा से बाहर भी देखने को मिल सकती है।

अपने बयान में राय ने शासन और पार्टी संगठन में व्यापक भ्रष्टाचार का हवाला दिया और कहा कि पार्टी के पिछले कार्यकाल के खिलाफ जनता का गुस्सा खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। पिछले एक साल से पार्टी नेतृत्व से धीरे-धीरे दूरी बनाते आ रहे वरिष्ठ सांसद ने आरजी कर अस्पताल दुष्कर्म-हत्याकांड मामले में तृणमूल के रवैये पर भी निशाना साधा था और इस मुद्दे पर वह बार-बार असहमति जताते रहे थे। दिल्ली में, राय ने संवाददाताओं से कहा, ”मैंने आरजी कर अस्पताल मामले पर खुले तौर पर आवाज उठाई थी। उसके बाद से पार्टी में मुझे धीरे-धीरे अलग-थलग किया जाने लगा। मेरी बस इतनी सी गलती थी कि मैंने कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की, क्योंकि मेरा मानना था कि सबूत मिटाने में उनकी बड़ी भूमिका थी।”

राय ने आरोप लगाया कि उस वक्त दोषियों को बचाने की कोशिश की जा रही थी। उन्होंने कहा कि उसी विवाद के बाद उन्होंने मन ही मन पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया था। उन्होंने कहा, ”वही मेरे लिए चरम सीमा थी। मुझे समझ आ गया कि मैं पार्टी में ज्यादा नहीं रहूंगा।” राय ने यह भी दावा किया कि कई क्षेत्रों में भ्रष्टाचार बेलगाम हो गया है और पार्टी के खिलाफ जनता का आक्रोश इस हद तक पहुंच गया कि चुनावी हार निश्चित हो गई। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में अहम पदों पर बैठे तृणमूल नेताओं की संपत्ति की जांच की मांग की और आरोप लगाया कि संगठन में कई ईमानदार लोगों को हाशिये पर धकेल दिया गया है। उन्होंने कहा, ”पार्टी में सभी बेईमान नहीं हैं। लेकिन बहुत से नेक लोगों को किनारे कर दिया गया है।” राजनीति के मामलों के जानकारों का मानना है कि इस घटनाक्रम का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि यह दिल्ली में हुआ, जबकि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की बैठक में सहयोगियों साथ मशविरे में व्यस्त था।

राय के इस्तीफे के बाद राज्यसभा में तृणमूल की सदस्य संख्या घटकर 12 रह गई है। संविधान विशेषज्ञ राय वर्षों से संसद में तृणमूल के मुख्य रणनीतिकारों में से एक रहे हैं और विधायी व संवैधानिक मुद्दों पर पार्टी की सबसे प्रभावी आवाज माने जाते रहे हैं। भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछे जाने पर राय ने कहा कि उन्होंने अभी किसी और पार्टी में शामिल होने का कोई फैसला नहीं किया है और संकेत दिया कि वे सक्रिय राजनीति से संन्यास भी ले सकते हैं। उन्होंने कहा, ”मैं राजनीति से पूरी तरह किनारा कर सकता हूं।” तृणमूल नेतृत्व ने राय के इस्तीफे पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। विधायी दल का विद्रोह अभी सुलझा नहीं है, ऐसे में राय के इस्तीफे से पार्टी की एकजुटता पर सवाल और गहरे होंगे तथा नेतृत्व की यह चिंता भी बढ़ेगी कि विधानसभा में मची उथल-पुथल कहीं दिल्ली तक न पहुंच जाए।

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