लखनऊ, 2 अक्टूबर। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला आज आधुनिक शहर के रूप में विकसित हो चुकी है, लेकिन करीब एक सदी पहले महात्मा गांधी ने जिन बुनियादी समस्याओं का उल्लेख किया था, उनमें से कई आज भी शहर में दिखाई देती हैं। पानी की किल्लत, संकरी सड़कें और बढ़ती भीड़ जैसी समस्याएं आज ट्रैफिक जाम और बढ़ते शहरी दबाव के रूप में सामने हैं। वहीं, अंग्रेजों के दौर में शिमला तक पहुंचा रेल संपर्क आज भी अपने मूल विस्तार से आगे नहीं बढ़ पाया है।
महात्मा गांधी 12 से 18 मई 1921 तक शिमला में रहे थे। इसी दौरान उन्होंने अपने प्रवास से जुड़े अनुभवों को संस्मरण के रूप में दर्ज किया था। यह संस्मरण 22 मई 1921 को ‘नवजीवन’ के गुजराती अंक में प्रकाशित हुआ था। गांधी ने करीब 7,500 फीट की ऊंचाई पर बसे शिमला को अपने लेख में ‘500वीं मंजिल’ जैसा बताया था और शासन तथा आम जनता के बीच दूरी का उल्लेख किया था।
पानी की समस्या पर गांधी ने जताई थी चिंता
‘गांधी इन शिमला’ पुस्तक के लेखक विनोद भारद्वाज के अनुसार, करीब 100 साल पहले गांधी ने जिन चुनौतियों का उल्लेख किया था, उनमें पानी की समस्या प्रमुख थी। गांधी ने अपने संस्मरण में लिखा था कि शिमला में पानी करीब 2,000 फीट नीचे से ऊपर पहुंचाया जाता था। जिस भवन में वह ठहरे थे, वहां पानी उपलब्ध था, लेकिन पानी ढोने वाले मजदूरों को दूर से पानी लाना पड़ता था। गांधी ने पानी की इस व्यवस्था को देखकर एक लोटा पानी इस्तेमाल करने में भी झिझक महसूस होने की बात लिखी थी। आज भी शिमला में पेयजल आपूर्ति और बढ़ती आबादी की जरूरतों को लेकर समय-समय पर चुनौतियां सामने आती रही हैं।
संकरी सड़कों से ट्रैफिक जाम तक
गांधी के शिमला प्रवास के दौरान शहर की सड़कें खड़ी और संकरी थीं। उस समय वाहनों की संख्या बहुत कम थी और घोड़े तथा रिक्शे प्रमुख परिवहन साधनों में शामिल थे। शारीरिक कमजोरी के कारण गांधी को भी रिक्शे से यात्रा करनी पड़ी थी। उन्होंने रिक्शा खींचने वाले मजदूरों की स्थिति पर भी सवाल उठाया और इंसान से बोझ ढोने वाले जानवर की तरह काम कराने पर आपत्ति जताई थी। उस समय यातायात सीमित था, लेकिन आज शिमला में वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण संकरी सड़कें ट्रैफिक जाम और पार्किंग की समस्या का कारण बन रही हैं।
ईदगाह मैदान में गांधी ने की थी सभा
शिमला प्रवास के दौरान 15 मई 1921 को महात्मा गांधी ने ईदगाह मैदान में एक सभा को संबोधित किया था। इसमें करीब 15 हजार लोगों के शामिल होने का उल्लेख मिलता है। गांधी अपने जीवनकाल में कुल 10 बार शिमला आए थे।
लाला लाजपत राय की प्रतिमा से भी जुड़ा है शिमला
शिमला की ऐतिहासिक विरासत का एक हिस्सा लाला लाजपत राय की प्रतिमा से भी जुड़ा है। 27 दिसंबर 1929 को महात्मा गांधी और पंडित मोतीलाल नेहरू ने लाहौर के गोल बाग में लाला लाजपत राय की प्रतिमा के शिलान्यास की नींव रखी थी। इसके बाद 1 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में विट्ठलभाई पटेल ने प्रतिमा का अनावरण किया था। विभाजन के समय प्रतिमा को लाहौर से भारत लाया गया और बाद में शिमला के स्कैंडल प्वाइंट पर स्थापित किया गया। प्रतिमा के नीचे लगे शिलालेख के पिछले हिस्से में इससे जुड़े इतिहास का उल्लेख बताया जाता है।
विकास के साथ पर्यावरण बचाने की चुनौती
1936 में जन्मे पूर्व आईएएस अधिकारी श्रीनिवास जोशी ने शिमला के मौजूदा विकास मॉडल को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि शहर में ऐसा विकास नहीं होना चाहिए, जिसमें विकास से ज्यादा नुकसान हो। उनके मुताबिक अवैज्ञानिक तरीके से सड़क निर्माण होने के कारण कई जगह घरों में दरारें जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। वहीं, शिमला के महापौर सुरेंद्र चौहान का कहना है कि शहर की पुरानी समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उनके मुताबिक पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने के लिए सरकार और नगर निगम मिलकर काम कर रहे हैं।


