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RSS की दो टूक- जाति जनगणना जरूरी, लेकिन समाज को बांटने की इजाजत नहीं

RSS की दो टूक- जाति जनगणना जरूरी, लेकिन समाज को बांटने की इजाजत नहीं

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नई दिल्ली, 22 मार्च। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने जाति जनगणना को लेकर अपना स्पष्ट रुख जाहिर किया है। उसका कहना है कि वह कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए इसका समर्थन करता है, लेकिन इसे समाज को बांटने के लिए इस्तेमाल करने का विरोध करता है।

RSS के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि संगठन जाति के मुद्दे को सामाजिक समरसता के नजरिए से देखता है, न कि टकराव के रूप में। उन्होंने कहा, ‘यदि आपसी प्रेम बढ़े और भेदभाव खत्म हो जाए, तो बड़ी समस्याएं भी सुलझ सकती हैं। बिना समरसता के छोटे मुद्दे भी बड़े विवाद बन जाते हैं।’

सामाजिक समरसता पर जोर

उन्होंने कहा कि मंदिरों, श्मशान घाटों, पानी के स्रोतों और सार्वजनिक जगहों पर सभी का प्रवेश खुला होना चाहिए और RSS के स्वयंसेवक स्थानीय स्तर पर ऐसी चिंताओं को दूर करने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय और सेवा भारती जैसी संस्थाओं का जिक्र करते हुए बताया कि ये संगठन एक बड़े जनसंपर्क नेटवर्क का हिस्सा हैं।

महिलाओं की भूमिका को और विस्तार देने की जरूरत

महिलाओं की भागीदारी के मुद्दे पर, आंबेकर ने ‘राष्ट्रीय सेविका समिति’ की समानांतर व्यवस्था का बचाव करते हुए कहा कि यह RSS की ‘शाखा’ प्रणाली की ही तरह काम करती है। साथ ही, उन्होंने महिलाओं की भूमिका को और विस्तार देने की जरूरत को भी स्वीकार किया। उन्होंने बताया कि ‘महिला संबंध’ नामक एक समन्वय तंत्र के ज़रिए निर्णय लेने की प्रक्रिया और जनसंपर्क अभियानों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।

भाजपा से रिश्तों पर क्या बोले?

आंबेकर ने संघ व भाजपा के संबंधों पर कहा कि RSS एक सामाजिक संगठन है, जो व्यक्ति निर्माण पर काम करता है। भाजपा से संबंधों को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों संगठन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। आंबेकर ने हिन्दुत्व को ‘एकजुट करने वाला विचार’ बताते हुए कहा कि यह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसे सिद्धांतों पर आधारित है, जो विविधता में एकता को मजबूत करता है। भारत का मॉडल समाज-केंद्रित है जबकि पश्चिम का मॉडल राज्य-केंद्रित होता है।

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