लखनऊ, 13 सितंबर। हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करते हैं। इस साल पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से होगी। यह अवधि करीब 16 दिनों तक चलती है। पितृपक्ष शुरू होने से पहले या इसके दौरान लोगों के मन में अक्सर सवाल रहता है कि क्या इस अवधि में नए कपड़े, गहने या घर का सामान खरीदना शुभ होता है? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष में हर तरह की खरीदारी पर रोक नहीं है, लेकिन कुछ वस्तुओं की खरीदारी से बचने की सलाह दी जाती है।
क्या पितृपक्ष में नए कपड़े खरीद सकते हैं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान नए सामान या कपड़े खरीदना पूरी तरह निषिद्ध नहीं है। हालांकि, गहने, नए वस्त्र, वाहन, मकान-जमीन और लोहे से बनी वस्तुओं जैसी बड़ी खरीदारी को इस अवधि में शुभ नहीं माना जाता।मान्यता है कि पितृपक्ष का समय पूर्वजों के स्मरण और श्राद्ध कर्म के लिए समर्पित होता है। ऐसे में दिखावे या भौतिक सुख से जुड़ी बड़ी खरीदारी से बचना बेहतर माना जाता है। हालांकि, रोजमर्रा के इस्तेमाल की जरूरी चीजें जरूरत के अनुसार खरीदी जा सकती हैं।
पितृपक्ष में क्यों नहीं किए जाते मांगलिक कार्य?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों का आयोजन नहीं किया जाता। इसकी वजह यह मानी जाती है कि यह अवधि पूरी तरह पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए समर्पित होती है। मांगलिक कार्यों में जहां उत्सव और उल्लास का माहौल रहता है, वहीं पितृपक्ष को गंभीर, संयमित और आध्यात्मिक अवधि माना गया है। इसलिए इस दौरान शुभ और मांगलिक आयोजनों को टालने की परंपरा है।
पितृपक्ष में कैसे कपड़े पहनने चाहिए?
पितृपक्ष के दौरान सादे और सात्विक कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। श्राद्ध और तर्पण के समय सफेद, हल्के पीले या अन्य हल्के रंग के वस्त्र पहनने की परंपरा है। मान्यता है कि सादगी से श्राद्ध कर्म करने पर व्यक्ति का ध्यान दिखावे के बजाय पितरों के प्रति श्रद्धा और सेवा पर केंद्रित रहता है।
पितृपक्ष में बाल और दाढ़ी कटवाना चाहिए या नहीं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष के दौरान बाल और दाढ़ी न कटवाने की परंपरा है। हालांकि, अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में इससे जुड़े नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं का पालन करना उचित माना जाता है।
पितृपक्ष में खान-पान का रखें विशेष ध्यान
पितृपक्ष के दौरान सात्विक भोजन करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में मांस, मछली, अंडा और अन्य तामसिक खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए। कई परिवार इस दौरान लहसुन और प्याज का सेवन भी नहीं करते। इसके अलावा शराब और अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में संयमित और सात्विक जीवनशैली अपनाने को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है।
घर का माहौल रखें शांत और सकारात्मक
पितृपक्ष के दौरान घर का वातावरण शांत और पवित्र रखने की सलाह दी जाती है। परिवार के सदस्यों को आपसी विवाद और झगड़े से बचना चाहिए। घर में प्रेम, सौहार्द और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना शुभ माना जाता है।
पशु-पक्षियों और जरूरतमंदों के साथ करें अच्छा व्यवहार
पितृपक्ष में असहाय और जरूरतमंद लोगों की मदद करना तथा पशु-पक्षियों के प्रति दया का भाव रखना धार्मिक दृष्टि से पुण्यकारी माना जाता है। किसी जीव को परेशान या प्रताड़ित करने से बचना चाहिए। मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण और सेवा भाव विशेष महत्व रखता है। इसलिए इस अवधि में विनम्रता, ईमानदारी और सम्मानजनक व्यवहार बनाए रखना चाहिए। किसी को अपशब्द न कहें और झूठ बोलने से भी बचें।
पितृपक्ष में इन बातों का रखें ध्यान
- श्राद्ध और तर्पण विधि-विधान से करें।
- जरूरतमंदों को भोजन और दान दें।
- सात्विक और संयमित भोजन करें।
- घर में झगड़े और नकारात्मक माहौल से बचें।
- पशु-पक्षियों के प्रति दया का भाव रखें।
- नशे और तामसिक गतिविधियों से दूर रहें।
- बड़ी और दिखावे वाली खरीदारी को टालना बेहतर माना जाता है।
- मांगलिक आयोजनों को पितृपक्ष के बाद करना परंपरागत रूप से उचित माना जाता है।
डिस्क्लेमर: पितृपक्ष से जुड़े नियम और मान्यताएं विभिन्न धर्मग्रंथों, क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। ऊपर दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है।


