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ICMR अध्ययन : छह माह की टीबी दवा पद्धति अधिक किफायती और प्रभावी

ICMR अध्ययन : छह माह की टीबी दवा पद्धति अधिक किफायती और प्रभावी

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नई दिल्ली, 12 फरवरी। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक आर्थिक मूल्यांकन से पता चला है कि भारत में बहु-दवा प्रतिरोधी और रिफैम्पिसिन-प्रतिरोधी तपेदिक (एमडीआर/आरआर-टीबी) के लिए छह माह की पूरी तरह मौखिक उपचार पद्धति न केवल कम लागत वाली है, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य परिणाम भी देती है। यह अध्ययन आईसीएमआर-राष्ट्रीय तपेदिक अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर-एनआईआरटी) द्वारा किया गया है।

अध्ययन में राष्ट्रीय तपेदिक उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत इस्तेमाल हो रहे बेडाक्विलाइन युक्त मौजूदा उपचार रेजिमेन कम अवधि (9–11 महीने) और लंबी अवधि (18–20 महीने) की तुलना बीपीएएल (बेडाक्विलाइन, प्रेटोमैनिड और लाइनज़ोलिड) तथा बीपीएएलएम (मोक्सीफ्लोक्सासिन सहित) रेजिमेन से की गई।

विश्लेषण में पाया गया कि बीपीएएल उपचार पद्धति अधिक प्रभावी और लागत-बचत करने वाली है। प्रत्येक अतिरिक्त गुणवत्ता-समायोजित जीवन वर्ष (क्यूएएलवाई) के लिए, मानक उपचार की तुलना में स्वास्थ्य प्रणाली को प्रति रोगी 379 रुपये कम खर्च करना पड़ता है। वहीं, बीपीएएलएम उपचार पद्धति भी अत्यधिक लागत-प्रभावी साबित हुई, जिसमें प्रति अतिरिक्त क्यूएएलवाई प्राप्त करने पर प्रति रोगी केवल 37 रुपये का अतिरिक्त व्यय होता है।

अध्ययन के अनुसार दोनों नई उपचार पद्धतियों में दवाओं, अस्पताल यात्राओं और अनुवर्ती देखभाल सहित कुल स्वास्थ्य खर्च या तो कम है या मौजूदा उपचार के बराबर है।

विशेषज्ञों के अनुसार एमडीआर/आरआर-टीबी के इलाज में लंबी अवधि, दुष्प्रभाव और अधिक लागत जैसी बड़ी चुनौतियां रहती हैं। छह महीने की मौखिक दवाओं से उपचार की अवधि घटने के साथ मरीजों की उपचार-प्रतिबद्धता बढ़ सकती है, बीमारी से जुड़ी जटिलताएं कम हो सकती हैं और मरीज जल्दी सामान्य जीवन में लौट सकते हैं। इससे स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ भी कम होने की संभावना है।

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि बीपीएएल-आधारित उपचार पद्धतियां लागत-बचत करने वाली या अत्यधिक लागत-प्रभावी हो सकती हैं। ऐसे में भारत में दवा-प्रतिरोधी तपेदिक से निपटने के लिए इन्हें एनटीईपी के तहत कार्यक्रमगत रूप से अपनाने पर विचार किया जा सकता है। यह कदम उपचार की अवधि को 9–18 माह या उससे अधिक से घटाकर छह माह करने में मदद कर सकता है और तपेदिक उन्मूलन की दिशा में राष्ट्रीय प्रयासों को गति दे सकता है।

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