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उमर खालिद मामले पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ बोले- जब तक जुर्म साबित न हो, जमानत पाना आरोपित का अधिकार

उमर खालिद मामले पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ बोले- जब तक जुर्म साबित न हो, जमानत पाना आरोपित का अधिकार

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जयपुर, 18 जनवरी। भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ ने रविवार को कहा कि दोष सिद्ध होने से पहले जमानत हर आरोपित का अधिकार होना चाहिए। जयपुर साहित्य उत्सव में जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह बात वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी के सवाल के जवाब में कही, जिसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद की दिल्ली दंगों की साजिश मामले में जमानत अस्वीकृत करने पर चर्चा हुई।

पूर्व CJI ने कहा कि भारतीय कानून का आधार निर्दोष होने का अनुमान है। यदि कोई व्यक्ति पांच या सात वर्ष तक जेल में रहे और बाद में बरी हो जाए, तो खोए हुए वर्षों की भरपाई नहीं हो सकती। जमानत केवल तब रोकी जा सकती है, जब आरोपित अपराध दोबारा कर सकता हो, सबूतों में छेड़छाड़ कर सकता हो या कानून से बचने के लिए जमानत का फायदा उठा सकता हो।

कई वर्ष जेल में रह जाते लोग’

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जहां राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला हो, वहां अदालत को केस की गहन जांच करनी चाहिए। अन्यथा लोग कई साल जेल में रह जाते हैं। उन्होंने जमानत मामलों में जिला और सेशन कोर्ट द्वारा अस्वीकार किए जाने को चिंता का विषय बताया और कहा कि यही कारण है कि ये मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं।

जस्टिस सिस्टम में विलम्ब बड़ी समस्या

पूर्व CJI ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में मामलों के निस्तारण में विलम्ब एक बड़ी समस्या है। यदि न्यायिक प्रक्रिया में देरी हो रही है तो आरोपित को जमानत मिलनी चाहिए। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई अहम फैसलों का उल्लेख किया, जैसे महिलाओं को सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन, समलैंगिकता का अपराध नहीं मानना और चुनावी बॉन्ड योजना को रद करना।

न्यायपालिका में पारदर्शिता और सुधार पर जोर

जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुझाव दिया कि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सिविल सोसाइटी के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी शामिल किया जाए, ताकि न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़े और जनता का विश्वास मजबूत हो।

सेवानिवृत्ति के बाद निजी जीवन का आनंद ले रहे

उन्होंने बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद वे निजी जीवन का आनंद ले रहे हैं और किसी पद को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने कहा कि आज भी वैवाहिक बलात्कार को अपराध के रूप में शामिल नहीं किया गया है, जिसे सुधारने की आवश्यकता है।

पूर्व सीजेआई ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सजीव प्रसारण शुरू किया, जो केवल हिन्दी में नहीं बल्कि संविधान की आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध सभी भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध है।

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