बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन 19 वर्षों बाद कोलकाता लौटीं, बोलीं- ‘बहुत अच्छा लग रहा’
कोलकाता, 31 जुलाई। बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन शुक्रवार को लगभग 19 वर्षों बाद कोलकाता लौटीं। उन्होंने इस यात्रा को एक भावुक वापसी करार दिया। शनिवार को आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के पहले आई तस्लीमी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने के लिए आए लोगों का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और कहा, ‘वापस आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।’
ब्रिटेन से दिल्ली होते हुए मध्याह्न करीब 12.00 बजे कोलकाता एयरपोर्ट उतरीं तस्लीमा पारंपरिक बंगाली पोशाक यानी लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी में थीं और उन्होंने माथे पर लाल बिंदी लगा रखी थी। उन्होंने कोलकाता एयरपोर्ट उतरने से पहले सोशल मीडिया पर एक तस्वीर पोस्ट की और कैप्शन लिखा, ‘आज सुबह, मैं कोलकाता के लिए निकल पड़ी हूं।’
साहित्यिक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए यह यात्रा पूरी तरह से निजी
बताया जा रहा है कि उनकी यह यात्रा पूरी तरह से निजी और साहित्यिक कार्यक्रम के लिए है। वह ‘सेक्युलर मिशन’ और ‘ह्यूमन राइट्स एंड बांग्लादेश फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन’ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित एक सम्मेलन में भाग लेने वाली हैं, जिसका उद्देश्य धार्मिक कट्टरपंथ का विरोध करना और स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देना है। ऐतिहासिक रवींद्र सदन में होने वाले इस कार्यक्रम में उनके भाषण देने की उम्मीद है।
उल्लेखनीय है कि नवम्बर 2007 में, उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द्विखंडितो’ और कई अन्य रचनाओं ने कोलकाता में भारी विवाद और विरोध को जन्म दिया था। तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान, उन्हें सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए जल्दबाजी में कोलकाता छोड़ना पड़ा था। तब से वह मुख्य रूप से दिल्ली में रह रही थीं।
रवींद्र सदन में स्वागत समारोह, सीएम सुवेंदु अधिकारी भी शामिल होंगे
तस्लीमा नसरीन की इस बहुप्रतीक्षित यात्रा ने साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में काफी चर्चा छेड़ दी है। कट्टरपंथ का खुलकर विरोध करने के लिए जानी जाने वाली लेखिका ने लगभग दो दशकों के बाद कोलकाता में कदम रखा है। उनके सम्मान में शनिवार को रवींद्र सदन में एक स्वागत समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी शामिल होंगे।
आयोजकों का कहना है कि शनिवार का कार्यक्रम राजनीतिक मंच के रूप में काम करने के बजाय, धार्मिक कट्टरवाद के प्रति नसरीन के आजीवन विरोध का जश्न मनाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है।
