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इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी- ‘शादीशुदा पुरुष का वयस्क महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपराध नहीं’

इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी- ‘शादीशुदा पुरुष का वयस्क महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना अपराध नहीं’

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प्रयागराज, 27 मार्च। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच चल रहे विवाद के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि एक शादीशुदा पुरुष का किसी वयस्क महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं है।

हाई कोर्ट ने इस बात पर जो दिया कि सामाजिक नैतिकता, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के कोर्ट के कर्तव्य से ऊपर नहीं हो सकती। सुनवाई के दौरान, महिला के परिवार के वकील ने यह दलील दी कि चूंकि वह पुरुष पहले से ही शादीशुदा है, इसलिए किसी दूसरी महिला के साथ रहना उसके लिए एक अपराध है।

हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और इस बात को रेखांकित किया कि कानून को सामाजिक नैतिकता से अलग रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा, ‘ऐसा कोई अपराध नहीं है, जिसके तहत किसी शादीशुदा पुरुष पर, जो किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा हो, किसी भी तरह का मुकदमा चलाया जा सके।’

बेंच ने कहा, ‘नैतिकता और कानून को अलग-अलग रखना होगा। अगर कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है तो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत की कार्यवाही को सामाजिक राय और नैतिकता निर्देशित नहीं करेगी।’

यह टिप्पणी तब आई जब बेंच उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के एक जोड़े द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज पुलिस केस को रद करने की मांग की थी। अदालत ने यह भी गौर किया कि महिला पहले ही शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर चुकी थी, जिसमें उसने कहा था कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से उस व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही है।

वेबसाइट ‘बार एंड बेंच’ के अनुसार कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि उसके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य इस रिश्ते का विरोध कर रहे हैं और कथित तौर पर उन्होंने जान से मारने की धमकियां भी दी हैं। वहीं इस जोड़े ने ‘ऑनर किलिंग’ (इज्जत के नाम पर हत्या) का अंदेशा भी जाहिर किया है।

हाई कोर्ट ने कहा, ‘जाहिर तौर पर, पुलिस अधीक्षक द्वारा इस शिकायत पर अब तक कोई काररवाई नहीं की गई है। साथ रहने वाले दो बालिग लोगों की सुरक्षा करना पुलिस का फर्ज है। इस संबंध में पुलिस अधीक्षक पर विशेष ज़िम्मेदारियां हैं, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ और अन्य, (2018) 7 SCC 192’ मामले में अपने फैसले में कहा था। इस याचिका के साथ दोनों याचिकाकर्ताओं का एक संयुक्त हलफनामा भी लगाया गया है।’

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