लखनऊ, 10 अक्टूबर। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपनी सेहत का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है। इस दौरान शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं और ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव भी हो सकता है। ऐसे में हाई ब्लड प्रेशर को सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज करना मां और बच्चे, दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप से जुड़ी समस्याएं दुनियाभर में मातृ मृत्यु और गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं की प्रमुख वजहों में शामिल हैं। ऐसे में नियमित जांच, समय पर पहचान और उचित इलाज बेहद जरूरी है।
हर साल हाई बीपी से जुड़ी जटिलताओं के कारण हजारों महिलाओं की मौत
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 10 से 15 प्रतिशत गर्भधारण में हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी समस्याएं सामने आती हैं। इनमें प्री-एक्लेम्पसिया जैसी गंभीर स्थिति भी शामिल है। संगठन के मुताबिक, गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप से जुड़े विकारों के कारण हर साल करीब 42 हजार महिलाओं की मौत होती है। इसके अलावा, इन समस्याओं का संबंध पांच लाख से अधिक मृत-जन्म और नवजात शिशुओं की मौत के मामलों से भी है। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कितनी महत्वपूर्ण है। समय रहते समस्या का पता चलने पर डॉक्टर उचित इलाज और निगरानी के जरिए गंभीर जटिलताओं का जोखिम कम करने में मदद कर सकते हैं।
क्या है प्री-एक्लेम्पसिया?
प्री-एक्लेम्पसिया गर्भावस्था से जुड़ा उच्च रक्तचाप का एक गंभीर विकार है। यह आमतौर पर गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद विकसित होता है। इसमें ब्लड प्रेशर बढ़ने के साथ किडनी, लिवर या शरीर के दूसरे अंगों पर असर पड़ने के संकेत मिल सकते हैं। कई मामलों में पेशाब में प्रोटीन की मात्रा भी बढ़ जाती है। अगर समय पर इसकी पहचान और इलाज न हो, तो स्थिति गंभीर होकर एक्लेम्पसिया में बदल सकती है, जिसमें दौरे पड़ने का खतरा होता है। इससे मां और गर्भस्थ शिशु, दोनों की जान को खतरा हो सकता है।
प्रेग्नेंसी में हाई बीपी के इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
गर्भावस्था के दौरान कुछ लक्षण प्री-एक्लेम्पसिया का संकेत हो सकते हैं। हालांकि, कई महिलाओं में शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर हाई बीपी का पता लगाना संभव नहीं है।
इन संकेतों पर विशेष ध्यान दें:
- तेज या लगातार सिरदर्द होना।
- आंखों के सामने धुंधलापन आना या चमक दिखाई देना।
- पेट के ऊपरी हिस्से, खासकर दाईं ओर दर्द होना।
- चेहरे और हाथों में अचानक सूजन आना।
- सांस लेने में परेशानी होना।
- गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर का बढ़ा हुआ मिलना।
यदि इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। तेज सिरदर्द, नजर में बदलाव या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षणों को आपात स्थिति मानकर तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।
गर्भावस्था में हाई बीपी की जांच कैसे होती है?
डॉक्टर गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच के समय ब्लड प्रेशर मापते हैं। यदि बीपी बढ़ा हुआ मिलता है, तो स्थिति के अनुसार पेशाब में प्रोटीन की जांच, खून की जांच और किडनी व लिवर की कार्यक्षमता से जुड़े परीक्षण किए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर गर्भस्थ शिशु की वृद्धि और स्वास्थ्य की भी निगरानी की जाती है। इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि ब्लड प्रेशर कितना बढ़ा है, गर्भावस्था कितने सप्ताह की है और मां-बच्चे की स्थिति कैसी है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार दवाएं और अतिरिक्त निगरानी की सलाह देते हैं। गर्भावस्था में अपनी मर्जी से कोई दवा शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए।
WHO ने 2026-2035 के लिए तैयार की वैश्विक रणनीति
गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर से होने वाली मौतों और जटिलताओं को कम करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने 2026 से 2035 और उसके बाद तक के लिए वैश्विक रोडमैप जारी किया है। इसका उद्देश्य समय पर जांच, जरूरी दवाओं और जांच सुविधाओं की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों तथा आपातकालीन इलाज को मजबूत करना है। इस पहल का मकसद गर्भावस्था से जुड़ी उच्च रक्तचाप की समस्याओं की समय रहते पहचान करना और मां व नवजात शिशु की रोकी जा सकने वाली मौतों को कम करना है।
डिलीवरी के बाद भी बना रह सकता है हाई बीपी का खतरा
गर्भावस्था के दौरान हाई ब्लड प्रेशर या प्री-एक्लेम्पसिया का असर बच्चे के जन्म के बाद भी बना रह सकता है। ऐसी महिलाओं में भविष्य में उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, स्ट्रोक और किडनी संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए डिलीवरी के बाद भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहना चाहिए। नियमित प्रसवपूर्व जांच, लक्षणों के प्रति सतर्कता और समय पर इलाज मां और बच्चे के स्वास्थ्य की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
डिस्क्लेमर: यह खबर सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए है। गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर या प्री-एक्लेम्पसिया की आशंका होने पर डॉक्टर से परामर्श लें। गंभीर लक्षणों में तुरंत चिकित्सा सहायता प्राप्त करें।


