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संभल जामा मस्जिद विवाद के बीच ASI का कथन- प्राचीन ढांचे को गिराकर निर्माण का रिकॉर्ड में कोई उल्लेख नहीं

संभल जामा मस्जिद विवाद के बीच ASI का कथन- प्राचीन ढांचे को गिराकर निर्माण का रिकॉर्ड में कोई उल्लेख नहीं

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अलीगढ़, 3 मार्च। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में स्थित शाही जामा मस्जिद को लेकर जारी ऐतिहासिक व कानूनी विवाद के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने अपना पक्ष साफ कर दिया है। आरटीआई के जरिए मांगी गई जानकारी के जवाब में एएसआई ने कहा है कि उसके उपलब्ध अभिलेखों में ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि मस्जिद किसी प्राचीन ढांचे को गिराकर बनाई गई थी या फिर खाली जमीन पर इसका निर्माण हुआ था।

आरटीआई के जरिए मांगी गई जानकारी में हुआ खुलासा

यह जानकारी केंद्रीय सूचना आयोग के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान सामने आई। आरटीआई आवेदन में मस्जिद के निर्माण की परिस्थितियों, उस समय की जमीन के मालिक और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई थी।

आरटीआई आवेदन और ASI का जवाब

एएसआई ने स्पष्ट किया कि उसके रिकॉर्ड में इस तरह का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सत्य प्रकाश यादव ने आवेदन दाखिल कर यह जानना चाहा था कि मुगलकालीन जामा मस्जिद का निर्माण किन परिस्थितियों में हुआ था। क्या यह किसी पुराने मंदिर या अन्य ढांचे को गिराकर बनाई गई थी, या फिर खाली जमीन पर इसका निर्माण किया गया था?

मस्जिद का इतिहास और ASI रिकॉर्ड

सत्य प्रकाश ने इसके साथ ही उस समय जमीन के वास्तविक मालिक का नाम, मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज और निर्माण की अवधि से संबंधित प्रमाण भी मांगे थे। एएसआई ने अपने जवाब में कहा कि उसके पास उपलब्ध अभिलेखों में इस तरह की कोई जानकारी दर्ज नहीं है।

हालांकि विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार मस्जिद का निर्माण वर्ष 1526 में हुआ बताया गया है। एएसआई ने यह भी स्पष्ट किया कि यह इमारत जामा मस्जिद के नाम से ही संरक्षित है। उसके रिकॉर्ड में यह उल्लेख नहीं है कि इसे पहले किसी अन्य नाम से जाना जाता था।

संरक्षण का इतिहास और मौजूदा स्थिति

विभाग के अनुसार वर्ष 1920 में इस इमारत को संरक्षण के दायरे में लिया गया था और तब से यह एएसआई की निगरानी में है। वर्तमान में भी यह एक सक्रिय मस्जिद के रूप में मौजूद है और स्थानीय समुदाय द्वारा उपयोग में लाई जा रही है।

केंद्रीय सूचना आयोग ने एएसआई के जवाब को सही ठहराया

वहीं मामले की सुनवाई के दौरान केंद्रीय सूचना आयोग ने एएसआई के जवाब को सही ठहराया और स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण की जिम्मेदारी केवल उपलब्ध रिकॉर्ड की जानकारी देने तक सीमित है। आयोग ने कहा कि किसी विभाग को नई जानकारी जुटाने या ऐतिहासिक शोध कर निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। एएसआई के पास जो रिकॉर्ड उपलब्ध थे, वे आवेदक को दे दिए गए हैं और इस आधार पर अपील को खारिज कर दिया गया।

विवाद और प्रशासन की सतर्कता

उल्लेखनीय है कि संभल की जामा मस्जिद पिछले कुछ समय से ऐतिहासिक दावों और कानूनी याचिकाओं के कारण चर्चा में रही है। एक याचिका में दावा किया गया है कि मस्जिद का निर्माण किसी प्राचीन मंदिर स्थल पर किया गया था। इसी दावे को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और तनाव की घटनाएं भी सामने आई थीं, जिसके बाद प्रशासन को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ी।

दस्तावेजी प्रमाण की आवश्यकता

हालांकि अब एएसआई के हालिया जवाब से यह साफ हो गया है कि सरकारी रिकॉर्ड में इस दावे की पुष्टि या खंडन से जुड़ा कोई प्रत्यक्ष दस्तावेज मौजूद नहीं है। यानी विभाग के पास ऐसा कोई अभिलेख नहीं है, जो यह बताए कि मस्जिद किसी ढांचे को गिराकर बनाई गई थी या नहीं। इतिहास से जुड़े कई विवादों में अक्सर मौखिक परंपराएं, स्थानीय कथाएं और विभिन्न पक्षों के दावे सामने आते हैं। लेकिन सरकारी स्तर पर किसी भी निष्कर्ष के लिए दस्तावेजी प्रमाण को ही आधार माना जाता है।

भविष्य में क्या होगी न्यायिक प्रक्रिया?

चूंकि यह मुद्दा धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों पहलुओं से जुड़ा है, लिहाजा किसी भी बयान या दस्तावेज को लेकर जनभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। फिलहाल एएसआई और केंद्रीय सूचना आयोग के जवाब के बाद स्थिति स्पष्ट है कि सरकारी अभिलेखों में विवादित दावों की पुष्टि या खंडन से संबंधित कोई ठोस दस्तावेज दर्ज नहीं है। अब यदि किसी पक्ष द्वारा नए दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं तो वही न्यायिक प्रक्रिया में विचार का विषय बनेंगे।

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