अमेरिका का अगला निशाना कौन?
ईरान और अमेरिका का युद्ध आगे बढ़ चुका है. अमेरिका और इसराइल ख़ामेनई को न्यूट्रलाइज करने में कामयाब रहे. और यह दोनों राष्ट्र इसको अपनी जीत बता रहे हैं. ईरान ने अपने धार्मिक गुरु का अंत का बदला लेने की घोषणा करते हुए कई खाड़ी देशों पर हमला किया. इसके पीछे का कारण यही था कि इन देशों में अमेरिका के डिफेंस सेंटर थे. ईरान सिर्फ यही पर ही नहीं रुक तो उसने दुबई सहित कई सारे ठिकानों पर जहां c.v.l.ans इलाके है वहां पर भी आक्रमण किया.

ईरान के लीडर ख़ामेनई के अंत के बाद दो अलग-अलग दृश्य सामने आए. जो शिया मुस्लिम है वह अपने नेता के अंत पर दुख जताते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं.और दूसरी तरफ एक ऐसा एक गुट है जो Reg.me Change चाहता है. वह group खुश है. वह ईरान में बदलाव चाहते हैं. लोकतंत्र चाहते हैं. ख़ामेनई ने अपने कार्यकाल के दौरान अनगिनत अत्याचार, दुराचार किया. और उसका अंत हो गया. ऐसा माना जाता है. लेकिन बात यह नहीं है.अब सवाल यह है कि ईरान किस रास्ते पर जाएगा ?

आर्थिक दृष्टि ईरान खत्म हो चुका है. ईरान कब तक अमेरिका और इजरायल के साथ लड़ेगा यह महत्वपूर्ण प्रश्न है. अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान की तबाही कैसी की यह हम अच्छी तरह से देख रहे हैं. अमेरिका का इतिहास रहा है कि जिस जिस देश पर अमेरिका ने ‘लोकतंत्र’ और ‘मानव अधिकार’ के नाम पर हस्तक्षेप करते हुए आक्रमण किया वह देश तबाह होते गए.
अमेरिका ने पहले इराक को अपना निशाना बनाया था. सद्दाम हुसैन के खिलाफ मोर्चा खोला था. वहां अमेरिकी सेना घुसी और बाद में सद्दाम हुसैन को अमेरिका ने फांसी पर लटकाया था. आज कैसा है इराक? बदलाव ला पाया अमेरिका? इराक के आसपास के देशों को भी अमेरिका ने पूरी तरह से तहस-नस कर दिया. इस के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए अमेरिका ने सीरिया, लेबनान जैसे देशों को बर्बाद कर दिया.
इस दौरान हजारों लोगों की मौत हुई. बच्चे – महिलाएं मारे गए. अमेरिका वहां कुछ कर पाया? नहीं ना. लोकतंत्र ला पाया ना विकास ,ना ही जीवन जीने की सुविधा वहां के लोगों को दे पाया. अपने हाल में छोड़कर अमेरिका निकल गया. अफगानिस्तान का हाल भी ऐसा ही है. ओसामा बिन लादेन को ख़त्म करने के इरादे से अमेरिकी सेना अफगानिस्तान के जमीन पर उतरी थी. ओसामा बिन लादेन को मारने में कई साल लग गए. लगभग 20 साल के बाद अमेरिका की सेना वहां पर थी . आखिर में यह समझा कि वह वहां पर लड़ाई नहीं लड़ सकते. वहां रहे 20 साल लेकिन तालिबान और.S.S को खत्म नहीं कर सकी. और 20 साल के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़. तब तक अफगानिस्तान रास्ते पर नहीं आया. और एक देश अमेरिका ने बर्बाद कर दिया. लोकतंत्र के नाम पर मानव अधिकार के नाम पर.
अमेरिका की नजर अपने पड़ोस में वेनेजुएला पर भी थी. वहा पर भी अमेरिका ने यह कहना शुरू किया ‘ वहां पर भी तानाशाही है ‘, ‘लोकतंत्र नहीं है’. ऐसा सारा बताते हुए, दुनिया को कहते हुए, अमेरिका ने चुपचाप एक रात को उसके राष्ट्रपति को उठाकर लेकर गए. और जेल में बंद कर दिया. यह सब करने के बाद भी अमेरिका को रोकने वाला और टोकने वाला कोई नहीं है. यूनाइटेड नेशन बस एक कठपुतली है. अपने सिक्योरिटी काउंसिल की मीटिंग करने के अलावा वह कुछ नहीं करती. आज तक हमारा कश्मीर का प्रॉब्लम भी उन्होंने नहीं सॉल्व किया.
अमेरिका के प्रमुख खुलेआम कहते हैं ‘मैं किसी से नहीं डरता’, ‘कोई इंटरनेशनल Laws को मैं नहीं मानता. अमेरिका बस अपने स्वार्थ के लिए सारे खेल और ऑपरेशंस करता आ रहा है. अमेरिका खाड़ी देशों से तेल चाहता है. जो उनके नीति के साथ चलेगा वह सब देश अच्छे. जो नहीं चलेगा उसका हल ईरान और इराक के जैसा होगा. अमेरिका अपना छिपा एजेंडा लेकर देश में घुसता है. नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश , श्रीलंका यह सारे देश भी उनके नजर में आए थे. Gen Z के नाम पर, बदलाव के नाम पर इन देशों में अमेरिका ने Reg.me Change किया.
तात्पर्य यही है कि अमेरिका सिर्फ और सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है. तेल के भंडार हथियाना चाहता है. दूसरे देशों पर अपनी नीति थोप कर बस मुनाफा कमाना चाहता है. दूसरों के घरों को तोड़कर अपने आप को शक्तिशाली बनाना चाहता है. यह नीति पहले से ही रही है. चाहे कोई भी प्रेसिडेंट क्यों ना हो युद्ध करके शांति प्रस्थापित करना चाहता है. अमेरिका का बस यह दिखावा है. युद्ध कर के अपने राष्ट्रप्रमुख को नोबेल पीस प्राइज भी दिलवाता है. जैसे कि अभी डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं ‘मैंने कितने सारे युद्ध रोके’, ‘कितने करोड़ लोगों की जान बचाई’. खुद को नोबेल प्राइज के लिए नॉमिनेट करना चाहते हैं. अमेरिका की यह सारी नौटंकी है. अमेरिका बस एक ही चीज को समझता है और है डॉलर को मजबूत करना. तेल भंडारों को काबिज करना और दूसरों पर दादागिरी करना. आखिर में अब सवाल यही है कि अमेरिका का अगला निशाना कौन होगा?. क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप का मकसद है मेक अमेरिका ग्रेट अगेन.
Varsha Pargat
