नई दिल्ली, 7 जुलाई। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के बुनकरों और कारीगरों को नमन करते हुए कहा कि हथकरघा क्षेत्र ग्रामीण सशक्तिकरण, महिला-नेतृत्व वाले विकास और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि केंद्र सरकार इस क्षेत्र को लगातार प्रोत्साहन और सहयोग देती रहेगी।
बुनकरों और कारीगरों के कौशल को किया नमन
प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस भारत की समृद्ध और जीवंत हथकरघा परंपरा का उत्सव है। उन्होंने कहा कि पीढ़ियों से बुनकरों और कारीगरों ने अपने कौशल, रचनात्मकता और समर्पण से भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और समृद्ध बनाने का काम किया है। उन्होंने कहा कि सरकार हथकरघा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयासरत है, क्योंकि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है।
देशवासियों से की खास अपील
प्रधानमंत्री ने लोगों से राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर अपने पसंदीदा हथकरघा उत्पादों और जीआरडब्ल्यूएम (GRWM) वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने की अपील की। उनका कहना था कि इससे बुनकरों और इस क्षेत्र से जुड़े लाखों लोगों का उत्साह बढ़ेगा तथा भारतीय हथकरघा उत्पादों को नई पहचान मिलेगी।
7 अगस्त को क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय हथकरघा दिवस?
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1905 के स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में की गई थी। केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 में इस दिवस को आधिकारिक रूप से मनाने की शुरुआत की, ताकि भारत की पारंपरिक बुनाई कला और उससे जुड़े कारीगरों को सम्मान मिल सके।
35 लाख से अधिक लोगों की आजीविका से जुड़ा है क्षेत्र
चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना (2019-20) के अनुसार, देश में लगभग 35.22 लाख हथकरघा बुनकर और संबद्ध श्रमिक इस क्षेत्र से जुड़े हैं। इनमें 72 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं, जो इस उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जनगणना के मुताबिक करीब 31.45 लाख हथकरघा परिवार इस परंपरागत उद्योग से जुड़े हुए हैं। वहीं, लगभग 8.48 लाख श्रमिक बुनाई से पहले और बाद की प्रक्रियाओं, जैसे वाइंडिंग, वार्पिंग, डाइंग और कैलेंडरिंग में कार्यरत हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी है भारतीय हथकरघा परंपरा
भारत की हथकरघा परंपरा का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। इसके प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता तक मिलते हैं। ऋग्वेद, रामायण, महाभारत और कौटिल्य के ग्रंथों में भारतीय कपास और रेशम की उत्कृष्ट गुणवत्ता का उल्लेख मिलता है। समय के साथ यह कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंची और देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाती गई। आज डिजाइन, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक बाजारों के जरिए भारतीय हथकरघा उत्पादों को नई पहचान मिल रही है।

