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बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में कैसे  जीती धारणा और  वास्तविकता  की जंग?

How did the BJP win the battle of perception versus reality in West Bengal?

How did the BJP win the battle of perception versus reality in West Bengal?

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By Varsha Pargat

पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह धारणा और  वास्तविकता  की जंग भी था। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी  ने जिस तरह से अपनी रणनीति तैयार की, उसने उसे केवल एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह समझना जरूरी है कि BJP ने यह “बैटल ऑफ परसेप्शन और रियलिटी” कैसे जीती।

BJP ने सबसे पहले राज्य में “परिवर्तन” की भावना को मजबूत किया। वर्षों से सत्ता में रही Mamata Banerjee की सरकार के खिलाफ एंटी-इंकम्बेंसी को BJP ने एक बड़े नैरेटिव में बदल दिया। “कटमनी”, “सिंडिकेट राज”, और “राजनीतिक हिंसा” जैसे मुद्दों को लगातार उछालकर BJP ने यह धारणा बनाई कि राज्य में शासन व्यवस्था कमजोर हो चुकी है। यह धारणा धीरे-धीरे लोगों के मन में बैठ गई कि बदलाव जरूरी है—यही perception BJP की सबसे बड़ी ताकत बना।

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BJP ने चुनाव को स्थानीय मुद्दों से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे से जोड़ा। Narendra Modi की रैलियों और भाषणों ने चुनाव को “डबल इंजन सरकार” के वादे से जोड़ दिया। मोदी की छवि एक मजबूत और निर्णायक नेता की रही है, जिसे BJP ने बंगाल के विकास के साथ जोड़ दिया। इससे मतदाताओं के बीच यह विश्वास पैदा हुआ कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी होने से विकास तेज होगा।

BJP ने पश्चिम बंगाल में अपने संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत किया। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति, आरएसएस और सहयोगी संगठनों का समर्थन, और घर-घर संपर्क अभियान. इस मजबूत संगठनात्मक ढांचे ने perception को reality में बदलने का काम किया। यानी जो माहौल मीडिया और रैलियों में बन रहा था, उसे वोट में बदलने के लिए संगठन ने निर्णायक भूमिका निभाई।

BJP ने बंगाल में सांस्कृतिक पहचान को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। “जय श्री राम” का नारा, दुर्गा पूजा और बंगाली अस्मिता को लेकर बहस. इन सबने एक नई राजनीतिक धारा को जन्म दिया। BJP ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह केवल एक राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की वाहक है। इससे एक बड़ा वर्ग भावनात्मक रूप से BJP के साथ जुड़ गया। केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे उज्ज्वला, आयुष्मान, और मुफ्त राशन को BJP ने चुनावी मुद्दा बनाया। लाभार्थियों को सीधे जोड़कर BJP ने यह संदेश दिया कि उसका शासन केवल वादों तक सीमित नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने वाला है। यह “रियलिटी” perception से जुड़कर वोट में बदल गई।

BJP ने धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण को भी रणनीतिक रूप से इस्तेमाल किया। कुछ क्षेत्रों में यह रणनीति BJP के लिए फायदेमंद साबित हुई, जहां उसने अपने कोर वोट बैंक को मजबूत किया। Suvendu Adhikari जैसे नेताओं ने BJP को स्थानीय स्तर पर मजबूती दी। इन नेताओं ने क्षेत्रीय मुद्दों को उठाकर पार्टी को जमीनी समर्थन दिलाया। BJP ने चुनाव को एक “संघर्ष” के रूप में प्रस्तुत किया. लोकतंत्र बनाम तानाशाही और विकास बनाम भ्रष्टाचार . इस तरह के नैरेटिव ने चुनाव को भावनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर गहरा बना दिया।

केवल सीटों की गणित नहीं थी, बल्कि यह धारणा को वास्तविकता में बदलने की कला का उदाहरण थी।

BJP ने मजबूत नैरेटिव बनाया, राष्ट्रीय नेतृत्व का लाभ उठाया, संगठन को मजबूत किया और मतदाताओं की भावनाओं से जुड़ाव स्थापित किया. इन सभी ने मिलकर BJP को इस “बैटल ऑफ परसेप्शन एंड रियलिटी” में बढ़त दिलाई।

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