Site icon hindi.revoi.in

पश्चिम बंगाल में पहली बार ‘कमल’ खिलने को तैयार, ममता बनर्जी का डेढ़ दशक से जारी साम्राज्य ध्वस्त

Social Share

कोलकाता, 4 मई। पश्चिम बंगाल विधानसभा की एक छोड़ 293 सीटों पर सोमवार को जारी मतगणना में परिणाम सामने आने लगे हैं और दोपहर बाद तक के ट्रेंड पूर्वी भारत के इस राज्य के चुनावी इतिहास में ऐतिहासिक बदलाव का संकेत दे रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जिस प्रकार प्रचंड बहुमत की ओर बढ़ रही है, उससे यही अंदाजा लग रहा है कि ममता बनर्जी की अगुआई वाले तृणमूल कांग्रेस (TMC) का डेढ़ दशक से जारी साम्राज्य ध्वस्त कर राज्य में पहली बार ‘कमल’ खिलने को तैयार है।

बंगाल चुनाव की मतगणना का विस्तृत विवरण

चुनाव आयोग से प्राप्त 293 सीटों के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भाजपा लगभग 200 सीटें जीतती प्रतीत हो रही है जबकि स्पष्ट बहुमत के लिए 147 सीटों की दरकार है। इसके विपरीत तृणमूल कांग्रेस लगभग 90 सीटों पर सिकुड़ती नजर आ रही है। अंतिम समाचार मिलने तक सीपीआई (एम) व कांग्रेस एक या दो सीटों के लिए संघर्षरत थीं।

फाल्टा सीट पर 21 मई को होगा पुनर्मतदान

उल्लेखनीय है कि 294 सीटों वाली राज्य विधानसभा के लिए दो चरणों में 23 व 29 अप्रैल को मतदान हुआ था। इनमें दक्षिण 24 परगना जिले के 15 बूथों पर दो मई को पुनर्मतदान कराया गया जबकि धांधली की शिकायत मिलने के बाद चुनाव आयोग ने फाल्टा विधानसभा के सभी 285 मतदान केंद्रों पर 21 मई को दोबारा वोटिंग का आदेश जारी किया है, जहां 24 मई को मतगणना है। इसीलिए आज 293 सीटों पर मतगणना हो रही है।

‘दीदी का खेला’ पड़ा उल्टा, भाजपा का ‘एम फैक्टर’ प्रभावी

देखा जाए तो इस बार की लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं बल्कि रणनीति, वादों और सामाजिक समीकरणों की भी रही। भाजपा ने जहां अपने वादों के जरिए मजबूत नैरेटिव खड़ा किया, वहीं ‘एम फैक्टर’ ने चुनावी गणित को पूरी तरह प्रभावित किया। भाजपा ने अवैध घुसपैठ को बड़ा मुद्दा बनाया। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को बाहर करने का वादा खासकर सीमावर्ती इलाकों में असरदार साबित हुआ। इसे सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों से जोड़कर पेश किया गया।

महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को हर माह आर्थिक सहायता देने जैसे वादों का भी बड़ा असर

महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को हर महीने आर्थिक सहायता देने जैसे वादों ने बड़ा असर डाला। केंद्र की योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने का भरोसा भी दिया गया, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग में पकड़ मजबूत हुई। राज्य में बढ़ती हिंसा और अपराध के आरोपों को भाजपा ने जोर-शोर से उठाया। ‘सख्त कानून व्यवस्था’ और यूपी मॉडल लागू करने का वादा शहरी और मध्यम वर्ग को प्रभावित करता दिखा।

‘सिंडिकेट राज’ खत्म करने और पारदर्शिता लाने का वादा भाजपा के प्रचार का अहम हिस्सा रहा। लंबे समय से सिस्टम से नाराज वोटर्स को यह संदेश सीधा लगा। बंद पड़े उद्योगों को चालू करने और नए निवेश लाने के वादे ने युवाओं और व्यापारिक वर्ग को आकर्षित किया। ‘सोनार बांग्ला’ का सपना इसी के साथ जोड़ा गया।

इन वादों के साथ ही, भाजपा ने इन एम फैक्टर पर भी काम किया, जिन्होंने चुनाव परिणाम को पलट दिया। करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी पारंपरिक रूप से टीएमसी के साथ रही है, लेकिन इस बार नए समीकरण बने। हूमायूं कबीर की पार्टी एजेयूपी ने इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की, जबकि ध्रुवीकरण ने भी असर डाला।

महिलाएं इस चुनाव में निर्णायक भूमिका में रहीं

महिलाएं इस चुनाव में निर्णायक भूमिका में रहीं। टीएमसी की योजनाओं और भाजपा के सुरक्षा व सम्मान के मुद्दों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। बंगाल से बाहर काम करने वाले लाखों लोगों का वोट इस बार अहम रहा। रोजगार के मुद्दे और ‘सोनार बांग्ला’ का विजन इन मतदाताओं को प्रभावित करता दिखा। उत्तर 24 परगना समेत कई इलाकों में मतुआ वोट निर्णायक रहा। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर इस समुदाय की उम्मीदें भाजपा के पक्ष में जाती दिखीं।

ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि और जुझारू राजनीति टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत रही। हालांकि इस बार भाजपा ने उन पर सीधे हमले से बचते हुए अलग रणनीति अपनाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियां, रोड शो और राष्ट्रीय मुद्दों पर फोकस ने भाजपा को नई ऊर्जा दी। उनकी लोकप्रियता ने नए वोटर्स को जोड़ने में मदद की। कुल मिलाकर, भाजपा ने अपने वादों और सामाजिक समीकरणों को जमीन पर उतारने में बढ़त हासिल की, जबकि टीएमसी इनका प्रभावी जवाब देने में संघर्ष करती दिखी। लंबे समय से सत्ता में रहने का असर भी एंटी-इंकंबेंसी के रूप में सामने आया।

Exit mobile version