नई दिल्ली, 12 मार्च। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का क्रीमी लेयर स्टेटस सिर्फ माता-पिता की आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता, और आरक्षण की योग्यता के लिए पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) और प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के बच्चों के साथ सरकारी कर्मचारियों के बच्चों से अलग व्यवहार करना, गलत भेदभाव है।
अंग्रेजी दैनिक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसा सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा, ‘सिर्फ इनकम ब्रैकेट के आधार पर क्रीमी लेयर स्टेटस तय करना, पोस्ट की कैटेगरी और स्टेटस पैरामीटर के रेफरेंस के बिना, कानून में साफ तौर पर टिकने लायक नहीं है।’
रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आर महादेवन की बेंच ने मद्रास, केरल और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसलों को सही ठहराते हुए यह फैसला सुनाया, जिनमें से हर एक ने सिविल सर्विस एग्जाम में OBC (नॉन-क्रीमी लेयर) का फायदा चाहने वाले कैंडिडेट की योग्यता की जांच की थी। हाई कोर्ट के कई ऑर्डर उन कैंडिडेट्स के पक्ष में दिए गए थे, जिन्होंने कहा था कि उन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर में इसलिए रखा गया कि उनके माता-पिता PSUs, बैंकों या प्राइवेट सेक्टर में काम करते थे।
शीर्ष अदालत ने अपनी दलील में साफ कहा, ‘क्रीमी लेयर को बाहर करने का मकसद यह पक्का करना है कि OBCs के अंदर सामाजिक रूप से आगे रहने वाले लोग असल में पिछड़े लोगों के लिए बने फायदों का फायदा न उठा सकें। इसका मकसद एक ही सामाजिक वर्ग के बराबर लोगों के बीच बनावटी फर्क पैदा करना नहीं है।’

