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नेताओं की भी हो Exams?

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Varsha Pargat

Raghav Chadha said “There should also be an examination to become a leader, because when every government job requires an exam, why not for becoming a leader?”

उनका यह स्टेटमेंट कई सवाल खड़े करता है. हम हर दिन देखते हैं कि कैसे हमारे नेता संसद में हंगामा खड़ा करते हैं. उनकी भाषा, उनका वर्तन , उनके विवादास्पद बयान और उनकी गिरती हुई राजनीति, यह सब देखकर निश्चित सवाल उठता है कि “क्या सही  में  हमारे नेता , सांसदों के qualification, exams  जरूरी करना चाहिए?”.

सबसे पहले क्या हमारे नेता देश का कार्य करना अपना काम मानते हैं?. या नहीं मानते? या देश की सेवा करना मानते हैं?. जब भी हम “Job” कहते हैं, तो उसके साथ आती है डिसिप्लिन ,रिस्पांसिबिलिटी. अकाउंटेबिलिटी, कमिटमेंट, वगैरे वगैरे . जब “Job” समझेंगे तो उसके कई सारे मायने होते हैं. उसका होता है एजुकेशन और उसके लिए होता है exam.

छोटी सी बात, स्कूलों में प्रवेश लेना है तो भी बच्चों को exams देनी पड़ती है. पेरेंट्स का इंटरव्यू होता है. उसके बाद बच्चे को स्कूल में प्रवेश मिलता है . कोई भी जॉब हो हमें कितनी सारी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. Return test, इंटरव्यूज और कितनी सारी प्रक्रिया. इन सारी प्रक्रियाओं के बाद हमारा भविष्य सुनिश्चित होता है. जॉब लगने के बाद भी conditions खत्म नहीं होती. आपको प्रमोशन चाहिए तो कम करो, काम अच्छा करो, सब required र्ड क्राइटेरिया पूर्ण करना पड़ता है, तब आपका प्रमोशन होता है.

 अगर आप में, या आपके काम में खामी होती है तो आपको प्रमोशन नहीं मिलेगा. कभी भी आपकी salary काटी जाती है. मतलब यह कि आपका परफॉर्मेंस चेक किया जाता है. यह सारे क्राइटेरिया नेताओं को लागू होते हैं क्या?. सवाल बड़ा है, बहुत बड़ा सवाल है. इसके बारे में अगर तभी सोचा जाता  जब हमारे संविधान की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी ,या संविधान लिखा जा रहा था. पर तब उनके मन में यह विचार भी नहीं आया होगा कि भविष्य में ऐसे भी दिन आएंगे जब नेताओं का शिक्षण , qualification, exams इसके बारे में चर्चा होगी.

अब हम चर्चा करते हैं “SMART” work की .इस शब्द में, “M”- Morality, A- Accountability,R-Reliable, T-Transparcy होती है . सत्ता , पावर को केंद्रित करते हुए नेता और पार्टी काम करती है. कहा जाता है कि, Power corrupts man and absolute power corrupts absolutely”. हमारे आजू-बाजू का चित्र इस बात को सच साबित करता है. राजनीति करना काम है, तो सारे नियम जो एक काम करने वाला व्यक्ति के संदर्भ में होते है , वे सभी  उन पर लागू  होने चाहिए.

 सैलरी ,प्रमोशन, अलाउंस यह सब परफॉर्मेंस के बेसिस पर लागू हो, ऐसे भी मांग रखी जानी चाहिए. अब नेता, सांसद, विधायक राजनीति को देश सेवा मानते हैं, लोगों की सेवा मानते हैं. हमारे यहां कहा जाता है की सेवा का कोई मोल नहीं होता. चुनाव के दौरान सभी नेता लोगों की यह भाषा होती है कि .समाज सेवा करेंगे, देश सेवा करेंगे”.

 लेकिन चुनाव के बाद जीतने के बाद, कौन जानता ?,कौन समाज? .ऐसा भी होता है सेवा मेवा बनते हुए दिखती है. कई सारे स्क्रैम्स, भ्रष्टाचार, करोड़ की संपत्ति, बंगले, गाड़ियां जो एक आम बात बन गई है. “सेवा” के नाम पर सारी सुविधाएं और  आराम का उपभोग. जब सेवा ही करना है तो फिर अपेक्षा कैसी?. “सेवा” ही है तो सैलरी क्यों ?. देश सेवा है तो सारी सुविधाएं क्यों? इतना ही नहीं निवृत्ती वेतन भी होता है. मतलब यह की सारी उंगलियां घी  में ही होती है.

 “सेवा” के नाम पर   कुछ नेता, जिनके ऊपर आरोप होता है, क्राइम, FIR  दर्ज होती है. वह भी चुनाव लड़ते हैं और आश्चर्य हम उनको जिताकर  भी देते हैं. राजनीति में भी दबंगई शुरू हुई. कई माफिया आए और जीते. लाखों करोड़ों की संपत्ति जुटाई . साथ ही  अपना माफिया राज चलाते है . तो यह कैसी सेवा हुई?. ये बड़ा ही  गंभीर प्रश्न है.

अगर एक सामान्य व्यक्ति कोई छोटा सा भी नियम तोड़ देता है, तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होती है. अगर कोई सामान्य ऑफिसर भ्रष्टाचार करता है तो तुरंत उनको सस्पेंड भी किया जाता है, तो फिर नेताओं को कठोर  नियम कानून के दायरे में क्यों नहीं रखा जाता?.

तो राघव चड्ढा जी ने जो स्टेटमेंट दिया है वह स्वागत पूर्ण  है. उसके ऊपर विचार मंथन होना आवश्यक है. प्रश्न यह है कि ऐसा कानून लाएगा  कौन?. हमारी संसद?.  संसद में चर्चा होगी ,डिबेट होगा, वोटिंग होगा जो एक सामान्य प्रक्रिया होती है. जो बात खुद सांसदों के ऊपर लागू होने वाली होगी तो क्या सांसद वह पार्लियामेंट में लायेंगे ?. आप भी सोचिए और इसीलिए बात उठाई है तो बात सिर्फ रिकॉर्ड पर ही रहेगी जिसका नतीजा हम सबको मालूम है.

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