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भारत ने वर्ष 2026 के लिए आधिकारिक रूप से संभाली BRICS की अध्यक्षता

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नई दिल्ली, 1 जनवरी। भारत ने गुरुवार को औपचारिक रूप से BRICS समूह की चक्रीय अध्यक्षता वर्ष 2026 के लिए संभाली। भारत ने ऐसे समय इस भूमिका को समावेशी विकास को बढ़ावा देने और वैश्विक आर्थिक शासन में ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के मंच के रूप में प्रस्तुत किया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ कदमों ने वैश्विक व्यापार प्रवाह को हिलाकर रख दिया है।

देख जाए तो नई दिल्ली की ब्रिक्स की अध्यक्षता दो समानांतर वास्तविकताओं के साथ शुरू हो रही है। पहला तो यह कि BRICS एक बहुत बड़ा क्लब बन गया है। दूसरा अहम पहलू यह है कि वैश्विक व्यापार प्रणाली तेजसंरक्षणवाद का सामना कर रही है।

BRICS का बढ़ता स्वरूप और सदस्यता की जटिलता

उल्लेखनीय है कि BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से हुई थी। पिछले दो वर्षों में इस समूह का विस्तार हुआ है और इसमें मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हो गए हैं।

सऊदी अरब की स्थिति विवादित बनी हुई है

वहीं सऊदी अरब की स्थिति विवादित बनी हुई है। BRICS की वेबसाइट ने इसे सदस्य के रूप में सूचीबद्ध किया है, लेकिन कई रिपोर्टों में कहा गया है कि रियाद ने अभी औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं की है।

वस्तुतः पैमाने के लिहाज से यह विस्तारित समूह बहुत बड़ा है। विश्व बैंक से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, BRICS में लगभग विश्व की 49% जनसंख्या, वैश्विक GDP का 29% और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 23% हिस्सा समाहित है।

ट्रंप टैरिफ तात्कालिक दबाव का कारण

व्यापार का संदर्भ महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का वॉशिंगटन के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गया है, जब से ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ लगाने का कदम उठाया है, जिसमें रूसी तेल की खरीद से जुड़ा अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है।

भारत संभवतः डॉलर-विरोधी रुख से बचेगा

ट्रंप ने बार-बार BRICS को एक साझा मुद्रा शुरू करने के खिलाफ चेतावनी दी है, 100% टैरिफ की धमकी दी है और सार्वजनिक बयान में कहा है कि BRICS खत्म हो गया है।

इस पृष्ठभूमि में, भारत की विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो प्रेरणा गांधी ने निक्केई एशिया को बताया कि भारत टकरावपूर्ण डॉलर-विरोधी रुख से बचते हुए स्थानीय मुद्रा में लेन-देन को बढ़ावा देगा ताकि रणनीतिक स्वायत्तता बनी रहे।

नैटस्ट्रैट के वरिष्ठ शोध फेलो राज कुमार शर्मा ने निक्केई एशिया को बताया कि भारत अध्यक्षता का उपयोग ‘बहुपक्षवाद की रक्षा और मजबूती’ के लिए करेगा क्योंकि संरक्षणवाद बढ़ रहा है — और वैश्विक संस्थानों में सुधार को आगे बढ़ाएगा।

‘ग्लोबल साउथ’ एजेंडा फिर लौटेगा, लेकिन एक नए प्रतिद्वंद्वी कैलेंडर के साथ

राज कुमार शर्मा ने बताया कि भारत से उम्मीद है कि वह ग्लोबल साउथ पर जोर देगा, जैसा कि उसने 2023 में अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान किया था, जिसमें मानव कल्याण और समावेशी विकास को प्राथमिकता दी जाएगी, और खाद्य व ईंधन की कमी, ऋण पुनर्गठन और जलवायु वित्त जैसे मुद्दों को एजेंडा में रखा जाएगा।

उन्होंने यह भी कहा कि यह एक राजनीतिक वास्तविकता है कि ग्लोबल साउथ एजेंडा को अमेरिका की G20 अध्यक्षता से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है, जहां ये प्राथमिकताएं प्रमुखता से नहीं रखी जा सकतीं।

विस्तार और पाकिस्तान : भारत कहां खींच सकता है सीमा

भारत की अध्यक्षता एक सक्रिय सदस्यता बहस के साथ आती है। शर्मा ने बताया कि नई दिल्ली स्पष्ट मानदंडों के लिए जोर दे सकती है ताकि BRICS अनियोजित विस्तार के कारण अपना अर्थ न खो दे, जिसमें पारदर्शी मानक और सर्वसम्मति-आधारित निर्णय शामिल हों।

वहीं आर्थिक तनाव का सामना कर रहा पाकिस्तान BRICS समर्थित न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) में शामिल होने का इच्छुक है ताकि उधार विकल्पों को बढ़ाया जा सके और उसने पहले भी BRICS सदस्यता के लिए आवेदन किया है। यह एक भू-राजनीतिक धार जोड़ता है, जो अन्यथा विकास-केंद्रित समूह के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

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